उपान्तवानीरवनोपगूढा-
न्यालक्ष्यपारिप्लवसारसानि ।
दूरावतीर्णा पिबतीव खेदा-
दमूनि पम्पासलिलानि दृष्टिः ॥

अन्वयः AI दूर-अवतीर्णा दृष्टिः खेदात् उपान्त-वानीर-वन-उपगूढानि आलक्ष्य-पारिप्लव-सारसानि अमूनि पम्पा-सलिलानि पिबति इव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उपान्तेति॥ उपान्तवानीरवनोपगूढानि पार्शअववञ्जलवनच्छन्नान्यालक्ष्या ईषद्दृश्याः पारिप्लवाश्चञ्चलाः सारसा येषुतान्यमूनि पम्पासलिलानि पम्पासरोजलानि दूरादवतीर्णा मे दृष्टिरत एव खेदात्पिबतीव। न विहातुमुत्सहत इत्यर्थथः ॥
Summary AI Rama says, "My gaze, descending from afar, seems to drink, out of weariness, these waters of the Pampa lake, which are enclosed by cane-groves on their banks and in which restless Sarasa birds are faintly visible."
सारांश AI बेत के जंगलों से घिरे और चंचल सारसों वाले इस पम्पा सरोवर के जल को, दूर से उतरती हुई मेरी दृष्टि थकान के कारण मानो प्यास बुझाने के लिए पी रही है।
पदच्छेदः AI
उपान्तवानीरवनोपगूढानिउपान्तवानीरवनउपगूढ (२.३) enclosed by cane-groves on their banks
आलक्ष्यपारिप्लवसारसानिआलक्ष्यपारिप्लवसारस (२.३) in which restless Sarasa birds are faintly visible
दूरावतीर्णादूरअवतीर्ण (१.१) descending from afar
पिबतिपिबति (√पा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) drinks
इवइव as if
खेदात्खेद (५.१) out of weariness
अमूनिअदस् (२.३) these
पम्पासलिलानिपम्पासलिल (२.३) waters of the Pampa lake
दृष्टिःदृष्टि (१.१) my gaze
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
पा न्त वा नी नो गू ढा
न्या क्ष्य पा रि प्ल सा सा नि
दू रा ती र्णा पि ती खे दा
मू नि म्पा लि ला नि दृ ष्टिः
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.