अत्रानुगोदं मृगयानिवृत्त-
स्तरंगवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा
स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥
अत्रानुगोदं मृगयानिवृत्त-
स्तरंगवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा
स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥
स्तरंगवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा
स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥
अन्वयः
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अत्र अनु-गोदम् वानीर-गृहेषु मृगया-निवृत्तः तरंग-वातेन विनीत-खेदः त्वत्-उत्सङ्ग-निषण्ण-मूर्धा सन् रहः सुप्तः अहम् इति स्मरामि ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अत्रेति॥ अत्र पञ्चवट्याम्। गोदा गोदावरी, तस्याः समीपेऽनुगोदम्।
अनुर्यत्समया (अष्टाध्यायी २.१.१५ ) इत्यव्ययीभावः। मृगयाया निवृत्तस्तरंगवातेन विनीतखेदो रहो रहसि। अत्यन्तसंयोगे द्वितीया। त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा सन्नहं वानीरगृहेषु सुप्तः स्मरामि। वाक्यार्थः कर्म। सुप्त इति यत्तत्स्मरामीत्यर्थः ॥
Summary
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I remember how here, along the Godavari, after returning from a hunt, my fatigue soothed by the breeze from the waves, I would sleep in the cane-bowers in private, with my head resting on your lap.
सारांश
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मुझे वह समय याद है जब गोदावरी के किनारे शिकार से लौटकर मैं बेत के कुंजों में तुम्हारी गोद में सिर रखकर सोता था और तरंगों की शीतल वायु मेरी थकान दूर करती थी।
पदच्छेदः
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| अत्र | अत्र | Here |
| अनुगोदं | अनुगोदम् | along the Godavari |
| मृगयानिवृत्तः | मृगया–निवृत्त (१.१) | returned from hunting |
| तरंगवातेन | तरंग–वात (३.१) | by the breeze from the waves |
| विनीतखेदः | विनीत–खेद (१.१) | with my fatigue removed |
| रहः | रहः | in private |
| त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा | त्वद्–उत्सङ्ग–निषण्ण–मूर्धन् (१.१) | with my head resting on your lap |
| स्मरामि | स्मरामि (√स्मृ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I remember |
| वानीरगृहेषु | वानीर–गृह (७.३) | in the bowers of cane |
| सुप्तः | सुप्त (√स्वप्+क्त, १.१) | sleeping |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | त्रा | नु | गो | दं | मृ | ग | या | नि | वृ | त्त |
| स्त | रं | ग | वा | ते | न | वि | नी | त | खे | दः |
| र | ह | स्त्व | दु | त्स | ङ्ग | नि | ष | ण्ण | मू | र्धा |
| स्म | रा | मि | वा | नी | र | गृ | हे | षु | सु | प्तः |
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