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एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा
सरिद्विदूरान्तरभावतन्वी ।
मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे
मुक्तावली कण्ठगतेव भूमेः ॥

अन्वयः AI प्रसन्न-स्तिमित-प्रवाहा, विदूर-अन्तर-भाव-तन्वी एषा मन्दाकिनी सरित् नग-उपकण्ठे भूमेः कण्ठगता मुक्तावली इव भाति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) एषेति॥ प्रसन्नो निर्मलः स्तिमितो निःस्पदः प्रवाहो यस्याः सा विदूरस्यान्तरस्य मध्यवर्त्यवकाशस्य भावात्तन्वी दूरदेशवर्तित्वात्तनुत्वेनावभासमाना मन्दाकिनी नाम काचिञ्चित्रकूटनिकटगैषा सरित्। गोपकण्ठेन भूमेः कण्ठगता मुक्तावलीव। भाति। अत्र नगस्य शिरस्त्वं तदुपकण्ठस्य कण्ठत्वं च गम्यते ॥
Summary AI This river Mandakini, with its clear and calm flow, appearing slender due to the great distance, shines on the slope of the mountain like a pearl necklace worn around the neck of the Earth.
सारांश AI पर्वत के पास स्थित शांत और निर्मल प्रवाह वाली यह मन्दाकिनी नदी ऐसी लग रही है मानो पृथ्वी के गले में पड़ी मोतियों की सुंदर माला हो।
पदच्छेदः AI
एषाएतद् (१.१) this
प्रसन्नस्तिमितप्रवाहाप्रसन्नस्तिमितप्रवाह (१.१) whose flow is clear and calm
सरित्सरित् (१.१) river
विदूरान्तरभावतन्वीविदूरअन्तरभावतन्वी (१.१) appearing slender due to the great distance
मन्दाकिनीमन्दाकिनी (१.१) Mandakini
भातिभाति (√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) shines
नगोपकण्ठेनगउपकण्ठ (७.१) on the slope of the mountain
मुक्तावलीमुक्तावली (१.१) a pearl necklace
कण्ठगताकण्ठगत (√गत+क्त, १.१) worn on the neck
इवइव like
भूमेःभूमि (६.१) of the earth
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
षा प्र न्न स्ति मि प्र वा हा
रि द्वि दू रा न्त भा न्वी
न्दा कि नी भा ति गो ण्ठे
मु क्ता ली ण्ठ ते भू मेः
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