प्रदक्षिणीकृत्य पयस्विनीं तां
सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता ।
प्रणम्य चानर्च विशालमस्याः
श्रृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धेः ॥

अन्वयः AI साक्षतपात्रहस्ता सुदक्षिणा पयस्विनीम् ताम् प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य च, अस्याः विशालम् शृङ्गान्तरम् अर्थसिद्धेः द्वारम् इव अनर्च।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) प्रदक्षिणीकृत्येति॥ अक्षतानां पात्रेण सह वर्तेते इति साक्षतपात्रौ ह्रस्तौ यस्याः सा सुदक्षिणा पयस्विनीं प्रशस्तक्षीरां तां धेनुं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य च। अस्याः धेन्वा विशालं शृङ्गमध्यम्। अर्थसिद्धेः कार्यसिद्धेर्द्वारं प्रवेशमार्गमिव। आनर्चार्चयामास, अर्चतेर्भौवादिकाल्लिट्॥
Summary AI Sudakshina, holding a vessel with sacred grains, circumambulated the milk-laden cow, bowed to her, and then worshipped the wide space between her horns as if it were the gateway to the fulfillment of her desire.
सारांश AI हाथ में अक्षत का पात्र लिए सुदक्षिणा ने उस पयस्विनी गाय की प्रदक्षिणा की और उसके सींगों के मध्य भाग को अपनी मनोरथ सिद्धि का द्वार मानकर उसका पूजन और वंदन किया।
पदच्छेदः AI
प्रदक्षिणीकृत्यप्रदक्षिणीकृत्य (प्रदक्षिणी√कृ+क्त्वा) having circumambulated
पयस्विनीम्पयस्विनी (२.१) the milk-laden one
ताम्तद् (२.१) her
सुदक्षिणासुदक्षिणा (१.१) Sudakshina
साक्षतपात्रहस्ताअक्षतपात्रहस्त (१.१) holding a vessel with sacred grains
प्रणम्यप्रणम्य (प्र√नम्+ल्यप्) having bowed
and
अनर्चअनर्च (√अर्च कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) worshipped
विशालम्विशाल (२.१) the wide
अस्याःइदम् (६.१) her
शृङ्गान्तरम्शृङ्गअन्तर (२.१) space between the horns
द्वारम्द्वार (२.१) the gateway
इवइव as if
अर्थसिद्धेःअर्थसिद्धि (६.१) of the fulfillment of her desire
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
प्र क्षि णी कृ त्य स्वि नीं तां
सु क्षि णा सा क्ष पा त्र स्ता
प्र म्य चा र्च वि शा स्याः
श्रृ ङ्गा न्त रं द्वा मि वा र्थ सि द्धेः
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