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तदीयमाक्रन्दितमार्तसाधो-
र्गुहानिबद्धप्रतिशब्ददीर्घम् ।
रश्मिष्ववादाय नगेन्द्रसक्तां
निवर्तयामास नृपस्य दृष्टिम् ॥

अन्वयः AI आर्त-साधोः गुहा-निबद्ध-प्रतिशब्द-दीर्घम् तदीयम् आक्रन्दितम् नगेन्द्र-सक्ताम् नृपस्य दृष्टिम् रश्मिषु अवादाय इव निवर्तयामास।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तदीयमिति॥ गुहानिबद्धेन प्रतिशब्देन प्रतिध्वनिना दीर्घम्। तस्या इदं तदीयम्। आक्रन्दितमार्तघोषणम्। आर्तेष्वापन्नेषु साधोर्हितकारिणो नृपस्य नगेन्द्रसक्तां दृष्टिम्। रश्मिषु प्रग्रहेषु। किरणप्रग्रहौ रश्मी इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१४६ ) । आदायेव गृहीत्वेव। निवर्तयामास॥
Summary AI Her cry of distress, made long by the echo in the cave, turned back the gaze of the king—the protector of the afflicted—which was fixed on the mountain, as if seizing it by the reins.
सारांश AI गुफा में गूँजती हुई गाय की उस करुण पुकार ने हिमालय की शोभा में डूबी हुई राजा की दृष्टि को सहसा अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
पदच्छेदः AI
तदीयम्तदीय (२.१) her
आक्रन्दितम्आक्रन्दित (१.१) cry of distress
आर्त-साधोःआर्तसाधु (६.१) of the protector of the distressed
गुहा-निबद्ध-प्रतिशब्द-दीर्घम्गुहानिबद्धप्रतिशब्ददीर्घ (१.१) made long by the echo bound in the cave
रश्मिषुरश्मि (७.३) by the reins
अवादायअवादाय (अव+आ√दा+ल्यप्) having seized
नगेन्द्र-सक्ताम्नगइन्द्रसक्त (२.१) which was fixed on the king of mountains
निवर्तयामासनिवर्तयामास (नि√वृत् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) turned back
नृपस्यनृप (६.१) of the king
दृष्टिम्दृष्टि (२.१) the gaze
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
दी मा क्र न्दि मा र्त सा धो
र्गु हा नि द्ध प्र ति ब्द दी र्घम्
श्मि ष्व वा दा गे न्द्र क्तां
नि र्त या मा नृ स्य दृ ष्टिम्
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