ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी
वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः ।
जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गा-
दुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारिः ॥
ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी
वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः ।
जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गा-
दुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारिः ॥
वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः ।
जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गा-
दुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारिः ॥
अन्वयः
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ततः मृगेन्द्र-गामी शरण्यः प्रसह-उद्धृत-अरिः नृपतिः जात-अभिषङ्गः सन् वध्यस्य मृगेन्द्रस्य वधाय निषङ्गात् शरम् उद्धर्तुम् ऐच्छत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तत इति॥ ततः सिंहदर्शनानन्तरं मृगेन्द्रगामी सिंहगामी। शरणं रक्षणम्।
शरणं गृहरक्षित्रोः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.५९ ) । शरणं रक्षणे गृहेइति यादवः। शरणे साधुः शरण्यः, तत्र साधुः (अष्टाध्यायी ४.४.९८ ) इति यत्प्रत्ययः। प्रसभेन बलात्कारेणोद्धृता अरयो येन स नृपती राजा जाताभिषङ्गो जातपराभवः सन्। अभिषङ्गः पराभवे इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.५९ ) । वध्यस्य वधार्हस्य। दण्डादिभ्यो यत् (अष्टाध्यायी ५.१.६६ ) इति यत्प्रत्ययः। मृगन्द्रस्य वधाय निषङ्गात्तूणीरात् तूणोपासङ्गतूणीरनिषङ्गा इषुधिर्द्वयोः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.८८ ) । शरमुद्धर्तुमैच्छत् ॥
Summary
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Then the king—who had the gait of a lion, was a refuge to the distressed, had forcibly uprooted his enemies, and was filled with anger—wished to draw an arrow from his quiver to slay the lion, who deserved to be killed.
सारांश
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शरण देने वाले और शत्रुओं का दमन करने वाले राजा दिलीप ने उस वध योग्य सिंह को मारने के लिए अत्यंत क्रोध के साथ तरकश से बाण निकालने का प्रयास किया।
पदच्छेदः
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| ततः | ततस् | then |
| मृगेन्द्रस्य | मृगेन्द्र (६.१) | of the king of beasts (lion) |
| मृगेन्द्र-गामी | मृगेन्द्र–गामिन् (१.१) | he who has the gait of a lion |
| वधाय | वध (४.१) | for the slaying |
| वध्यस्य | वध्य (६.१) | of the one to be slain |
| शरम् | शर (२.१) | an arrow |
| शरण्यः | शरण्य (१.१) | the protector |
| जात-अभिषङ्गः | जात–अभिषङ्ग (१.१) | he in whom anger had arisen |
| नृपतिः | नृपति (१.१) | the king |
| निषङ्गात् | निषङ्ग (५.१) | from the quiver |
| उद्धर्तुम् | उद्धर्तुम् (उद्√हृ+तुमुन्) | to draw out |
| ऐच्छत् | ऐच्छत् (√इष् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wished |
| प्रसह-उद्धृत-अरिः | प्रसह–उद्धृत–अरि (१.१) | he who had forcibly uprooted his enemies |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | मृ | गे | न्द्र | स्य | मृ | गे | न्द्र | गा | मी |
| व | धा | य | व | ध्य | स्य | श | रं | श | र | ण्यः |
| जा | ता | भि | ष | ङ्गो | नृ | प | ति | र्नि | ष | ङ्गा |
| दु | द्ध | र्तु | मै | च्छ | त्प्र | स | भो | द्धृ | ता | रिः |
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