तमार्यगृह्यं निगृहीतधेनु-
र्मनुष्यवाचा मनुवंशकेतुम् ।
विस्माययन्विस्मितमात्मवृत्तौ
सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ॥
तमार्यगृह्यं निगृहीतधेनु-
र्मनुष्यवाचा मनुवंशकेतुम् ।
विस्माययन्विस्मितमात्मवृत्तौ
सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ॥
र्मनुष्यवाचा मनुवंशकेतुम् ।
विस्माययन्विस्मितमात्मवृत्तौ
सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ॥
अन्वयः
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निगृहीत-धेनुः सिंहः आत्म-वृत्तौ विस्मितम् आर्य-गृह्यम् मनु-वंश-केतुम् सिंह-उरु-सत्त्वम् तम् विस्माययन् मनुष्य-वाचा निजगाद।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तमिति॥ निगृहीता पीडिता धेनुर्येन स सिंहः। आर्याणां सतां गृह्यं पक्ष्यम्।
पदास्वैरिबाह्यापक्ष्येषु च (अष्टाध्यायी ३.१.११९ ) इति क्यप्। मनुवंशस्य केतुं चिह्नं केतुवद्व्यावर्तकम्। सिंह इवोरुसत्त्वो महाबलस्तम्। आत्मनो वृत्तौ बाहुस्तम्भरूपे व्यापारेऽभूतपूर्वत्वाद्विस्मितम्। कर्तरि क्तः। तं दिलीपं मनुष्यवाचा करणेन। पुनर्विस्माययन् स्मयमाश्चर्यं प्रापयन्निजगाद। स्मिङ् ईषद्धसने इति धातोर्णिचि वृद्धावायादेशे शतृप्रत्यये च सति विस्माययन्निति रूपं सिद्धम्। विस्मापयन् इति पाठे पुगागममात्रं वक्यव्यम्। तञ्च नित्यं स्मयतेः (अष्टाध्यायी ६.१.५७ ) इति हेतुभयविवक्षायामेवेति भीस्म्योर्हेतुभये (अष्टाध्यायी १.३.६८ ) इत्यात्मनेपदे विस्मापयमान इति स्यात्। तस्मान्मनुष्यवाचा विस्माययन्निति रूपं सिद्धम्। करणविवक्षायां न कश्चिद्दोषः॥
Summary
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The lion, having seized the cow, spoke in a human voice to the king—the banner of Manu's lineage, respected by the noble, possessing the great courage of a lion, and astonished at his own powerlessness—further astonishing him.
सारांश
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उस सिंह ने गाय को अपने पंजों में दबाकर मनुष्य की वाणी में चकित राजा दिलीप से बात की। सिंह की यह अलौकिक शक्ति देखकर मनुवंश के कीर्तिस्तम्भ राजा और भी विस्मित हो गए।
पदच्छेदः
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| तम् | तद् (२.१) | to him |
| आर्य-गृह्यम् | आर्य–गृह्य (२.१) | who was respected by the noble |
| निगृहीत-धेनुः | निगृहीत–धेनु (१.१) | the one who had seized the cow |
| मनुष्य-वाचा | मनुष्य–वाच् (३.१) | with a human voice |
| मनु-वंश-केतुम् | मनु–वंश–केतु (२.१) | the banner of Manu's lineage |
| विस्माययन् | विस्माययत् (वि√स्मि+णिच्+शतृ, १.१) | causing to wonder |
| विस्मितम् | विस्मित (वि√स्मि+क्त, २.१) | who was astonished |
| आत्म-वृत्तौ | आत्मन्–वृत्ति (७.१) | at his own condition |
| सिंह-उरु-सत्त्वम् | सिंह–उरु–सत्त्व (२.१) | him who had the great courage of a lion |
| निजगाद | निजगाद (नि√गद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| सिंहः | सिंह (१.१) | the lion |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मा | र्य | गृ | ह्यं | नि | गृ | ही | त | धे | नु |
| र्म | नु | ष्य | वा | चा | म | नु | वं | श | के | तुम् |
| वि | स्मा | य | य | न्वि | स्मि | त | मा | त्म | वृ | त्तौ |
| सिं | हो | रु | स | त्त्वं | नि | ज | गा | द | सिं | हः |
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