इति प्रगल्भं पुरुषाधिराजो
मृगाधिराजस्य वचो निशम्य ।
प्रत्याहतास्त्त्रो गिरिशप्रभावा-
दात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ॥
इति प्रगल्भं पुरुषाधिराजो
मृगाधिराजस्य वचो निशम्य ।
प्रत्याहतास्त्त्रो गिरिशप्रभावा-
दात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ॥
मृगाधिराजस्य वचो निशम्य ।
प्रत्याहतास्त्त्रो गिरिशप्रभावा-
दात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ॥
अन्वयः
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इति मृग-अधिराजस्य प्रगल्भम् वचः निशम्य, गिरिश-प्रभावात् प्रति-आहत-अस्त्रः पुरुष-अधिराजः आत्मनि अवज्ञाम् शिथिली-चकार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
इति प्रगल्भं पुरुषाणामधिराजो नृप इति प्रगल्भं मृगाधिराजस्य वचोनिशम्य श्रुत्वा गिरिशस्येश्वरस्य प्रभावात्प्रत्याहतास्त्त्रः` कुण्ठितास्त्त्रः सन् आत्मनि विषयेऽववज्ञामपमानं शिथिलीचकार। तत्याजेत्यर्थः। अवज्ञातोऽहमिति निर्वेदं न प्रापेत्यर्थः। समानेषु हि क्षत्रियाणामभिमानः न सर्वेश्वरं प्रतीति भावः ॥
Summary
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Having heard the bold speech of the king of beasts, the sovereign of men, whose weapon was rendered useless by the power of Shiva, lessened the self-contempt he felt.
सारांश
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सिंह के इन गर्वपूर्ण वचनों को सुनकर राजा दिलीप ने, भगवान शिव के प्रभाव से अपने अस्त्र के विफल होने पर, स्वयं के प्रति ग्लानि का त्याग कर दिया।
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| प्रगल्भम् | प्रगल्भ (२.१) | bold |
| पुरुष-अधिराजः | पुरुष–अधिराज (१.१) | the sovereign of men |
| मृग-अधिराजस्य | मृग–अधिराज (६.१) | of the king of beasts |
| वचः | वचस् (२.१) | speech |
| निशम्य | निशम्य (नि√शम्+ल्यप्) | having heard |
| प्रति-आहत-अस्त्रः | प्रति–आहत–अस्त्र (१.१) | he whose weapon was rendered useless |
| गिरिश-प्रभावात् | गिरिश–प्रभाव (५.१) | due to the power of Girisha (Shiva) |
| आत्मनि | आत्मन् (७.१) | in himself |
| अवज्ञाम् | अवज्ञा (२.१) | self-contempt |
| शिथिली-चकार | चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | loosened |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | प्र | ग | ल्भं | पु | रु | षा | धि | रा | जो |
| मृ | गा | धि | रा | ज | स्य | व | चो | नि | श | म्य |
| प्र | त्या | ह | ता | स्त्त्रो | गि | रि | श | प्र | भा | वा |
| दा | त्म | न्य | व | ज्ञां | शि | थि | ली | च | का | र |
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