मान्यः स मे स्थावरजंगमानां
सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः ।
गुरोरपीदं धनमाहिताग्ने-
र्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥
मान्यः स मे स्थावरजंगमानां
सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः ।
गुरोरपीदं धनमाहिताग्ने-
र्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥
सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः ।
गुरोरपीदं धनमाहिताग्ने-
र्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥
अन्वयः
AI
स्थावर-जङ्गमानाम् सर्ग-स्थिति-प्रत्यवहार-हेतुः सः शिवः मे मान्यः। तथापि आहित-अग्नेः गुरोः इदम् धनम् अपि पुरस्तात् नश्यत् सत् अनुपेक्षणीयम् न भवति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मान्य इति॥ प्रत्यवहारः प्रलयः। स्थावराणां तरुशैलादीनां जंगमानां मनुष्यादीनां सर्गस्थितिप्रत्यवहारेषु हेतुः स ईश्वरो मे मम मान्यः पूज्यः। अलङ्घ्यशासन इत्यर्थः। शासनं च
सिंहत्वमङ्कागतसत्त्ववृत्ति(२।३८) इत्युक्तरूपम्। तर्हि विसृज्य गम्यताम्; नेत्याह-गुरोरपीति। पुरस्तादग्रे नश्यदिदमाहिताग्नेगुरोर्धनमपि गोरूपमनुपेक्षणीयम्। आहिताग्नेः इति विशेषणेनानुपेक्षाकारणं हविः साधनत्वं सूचयति॥
Summary
AI
"He (Shiva), the cause of creation, preservation, and destruction of all beings, is worthy of my respect. Yet, this cow, the wealth of my guru who maintains the sacred fire, cannot be neglected as it perishes before my eyes."
सारांश
AI
चराचर जगत की सृष्टि, स्थिति और संहार के कारण भगवान शिव मेरे लिए पूजनीय हैं, किंतु अग्निहोत्री गुरु के इस धन (गाय) का मेरे सामने नष्ट होना भी उपेक्षणीय नहीं है।
पदच्छेदः
AI
| मान्यः | मान्य (१.१) | to be respected |
| सः | तद् (१.१) | he (Shiva) |
| मे | अस्मद् (६.१) | by me |
| स्थावर-जङ्गमानाम् | स्थावर–जङ्गम (६.३) | of the movable and immovable |
| सर्ग-स्थिति-प्रत्यवहार-हेतुः | सर्ग–स्थिति–प्रत्यवहार–हेतु (१.१) | the cause of creation, preservation, and destruction |
| गुरोः | गुरु (६.१) | of the guru |
| अपि | अपि | yet |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| धनम् | धन (१.१) | wealth (the cow) |
| आहित-अग्नेः | आहित–अग्नि (६.१) | of one who maintains the sacred fire |
| नश्यत् | नश्यत् (√नश्+शतृ, १.१) | perishing |
| पुरस्तात् | पुरस्तात् | in front of me |
| अनुपेक्षणीयम् | अनुपेक्षणीय (१.१) | not to be neglected |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | न्यः | स | मे | स्था | व | र | जं | ग | मा | नां |
| स | र्ग | स्थि | ति | प्र | त्य | व | हा | र | हे | तुः |
| गु | रो | र | पी | दं | ध | न | मा | हि | ता | ग्ने |
| र्न | श्य | त्पु | र | स्ता | द | नु | पे | क्ष | णी | यम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.