अथैकधेनोरपराधचण्डा-
द्गुरोः कृशानुप्रतिमाद्बिभेषि ।
शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं
गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोध्नीः ॥
अथैकधेनोरपराधचण्डा-
द्गुरोः कृशानुप्रतिमाद्बिभेषि ।
शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं
गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोध्नीः ॥
द्गुरोः कृशानुप्रतिमाद्बिभेषि ।
शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं
गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोध्नीः ॥
अन्वयः
AI
अथ (यदि त्वम्) एकधेनोः (विषये) अपराधचण्डाद् कृशानुप्रतिमात् गुरोः बिभेषि, (तर्हि) कोटिशः घटोध्नीः गाः स्पर्शयता भवता अस्य मन्युः विनेतुम् शक्यः (अस्ति)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथेति पक्षआन्तरे, अथवा। एकैव धेनुर्यस्य तस्मात्। अयं कोपकारणोपन्यास इति ज्ञेयम्। अत एवापराधे गवोपेक्षालक्षणे सति चण्डादतिकोपनात्।
चण्डस्त्वत्यन्तकोपनः इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.३२ ) । अत एव कृशानुः प्रतिमोपमा यस्य तस्मादग्निकल्पाद्गुरोर्बिभेषि इति काकुः। भीत्रार्थानां भयहेतुः (अष्टाध्यायी १.४.२५ ) इत्यपादानात्पञ्चमी। अल्पवित्तस्य धनहानिरतिदुःसहेति भावः। अस्य गुरोर्मन्युः क्रोधः। मन्युर्दैन्ये क्रतौ क्रुधि इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.३२ ) । घटा इवोधांसि यासां ता घटोध्नीः। ऊधसोऽनङ् (अष्टाध्यायी ५.४.१३१ ) इत्यनङादेशः। बहुव्रीहेरूधसो ङीष् (अष्टाध्यायी ४.१.२५ ) इति ङीष्। कोटिशो गाः स्पर्शयता प्रतिपादयता। विश्राणनं वितरणं स्पर्शनं प्रतिपादनम् इत्यमरः (अमरकोशः २.७.३१ ) । भवता विनेतुमपनेतुं शक्यः ॥
Summary
AI
"Or, if you fear your guru—who is like fire and fierce in his anger over an offense concerning his single cow—his wrath can be appeased by you, by gifting him millions of cows with pot-like udders."
सारांश
AI
यदि आप एक गाय के खोने से अग्नि के समान तेजस्वी गुरु के क्रोध से भयभीत हैं, तो उन्हें घड़े के समान थन वाली करोड़ों गायें दान कर उनका क्रोध शांत कर सकते हैं।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | Or if |
| एकधेनोः | एक–धेनु (६.१) | regarding the one cow |
| अपराधचण्डाद् | अपराध–चण्ड (५.१) | from the one fierce in anger over an offense |
| गुरोः | गुरु (५.१) | from the guru |
| कृशानुप्रतिमात् | कृशानु–प्रतिम (५.१) | who is like fire |
| बिभेषि | बिभेषि (√भी कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are afraid |
| शक्यः | शक्य (१.१) | is possible |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| मन्युः | मन्यु (१.१) | anger |
| भवता | भवत् (३.१) | by you |
| विनेतुम् | विनेतुम् (वि√नी+तुमुन्) | to appease |
| गाः | गो (२.३) | cows |
| कोटिशः | कोटिशस् | by the crores |
| स्पर्शयता | स्पर्शयत् (√स्पृश्+णिच्+शतृ, ३.१) | by causing to give |
| घटोध्नीः | घट–ऊधस् (२.३) | with pot-like udders |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थै | क | धे | नो | र | प | रा | ध | च | ण्डा |
| द्गु | रोः | कृ | शा | नु | प्र | ति | मा | द्बि | भे | षि |
| श | क्यो | ऽस्य | म | न्यु | र्भ | व | ता | वि | ने | तुं |
| गाः | को | टि | शः | स्प | र्श | य | ता | घ | टो | ध्नीः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.