आस्वादवद्भिः कवलस्तृणानां
कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च ।
अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः
सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥
आस्वादवद्भिः कवलस्तृणानां
कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च ।
अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः
सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥
कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च ।
अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः
सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥
अन्वयः
AI
सः सम्राट् आस्वादवद्भिः तृणानाम् कवलैः कण्डूयनैः दंशनिवारणैः च अव्याहतैः स्वैरगतैः तस्याः समाराधनतत्परो अभूत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
आस्वादवद्भिरिति॥ सम्राट् मण्डलेश्वरः।
येनेष्टं राजसूयेन मण्डलस्येश्वरश्च यः। शास्ति यश्चाज्ञया राज्ञः स सम्राट् इत्यमरः (अमरकोशः २.५.२९ ) । स राजा। आस्वादवद्भी रसवद्भिः। स्वादयुक्तैरित्यर्थः। तृणानां कवलैर्ग्रासैः ग्रासस्तु कवलार्थकः इत्यमरः (अमरकोशः २.५.२९ ) । कण्डूयनैः खर्जनैः। दंशानां वनमक्षिकाणां निवारणैः। दंशस्तु वनमक्षिका इत्यमरः (अमरकोशः २.५.२९ ) । अव्याहतैरप्रतिहतैः स्वैरगतैः स्वच्छन्दगमनैश्च तस्या धेन्वाः समाराधनतत्परः शुश्रूषासक्तोऽभूत्। तदेव परं प्रधानं यस्येति तत्परः। तत्परे प्रसितासक्तौ इत्यमरः (अमरकोशः २.५.२९ ) ॥
Summary
AI
The emperor devoted himself entirely to serving the cow. He offered her delicious mouthfuls of grass, scratched her body for comfort, drove away biting insects, and allowed her to wander freely and without any hindrance through the forest.
सारांश
AI
वह सम्राट उस गाय को स्वादिष्ट घास खिलाने, शरीर खुजलाने, मक्खियों को दूर करने और बिना किसी बाधा के उसकी स्वेच्छाचारी गति का अनुसरण करने के माध्यम से उसकी सेवा में लीन हो गए।
पदच्छेदः
AI
| आस्वादवद्भिः | आस्वाद (+वतुप्, ३.३) | with tasty |
| कवलैः | कवल (३.३) | with mouthfuls |
| तृणानाम् | तृण (६.३) | of grass |
| कण्डूयनैः | कण्डूयन (√कण्डूय्+ल्युट्, ३.३) | by scratching |
| दंशनिवारणैः | दंश–निवारण (नि√वृ+ल्युट्, ३.३) | by warding off gadflies |
| च | च | and |
| अव्याहतैः | व्याहत (वि+आ√हन्+क्त, ३.३) | unimpeded |
| स्वैरगतैः | स्वैर–गत (√गम्+क्त, ३.३) | by free movements |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तस्याः | तद् (६.१) | her |
| सम्राट् | सम्राज् (सम्√राज्+क्विप्, १.१) | the emperor |
| समाराधनतत्परः | आराधन (सम्+आ√राध्+ल्युट्)–तत्पर (१.१) | intent on serving |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | स्वा | द | व | द्भिः | क | व | ल | स्तृ | णा | नां |
| क | ण्डू | य | नै | र्दं | श | नि | वा | र | णै | श्च |
| अ | व्या | ह | तैः | स्वै | र | ग | तैः | स | त | स्याः |
| स | म्रा | ट्स | मा | रा | ध | न | त | त्प | रो | ऽभूत् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.