क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः
क्षत्त्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः
प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥
क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः
क्षत्त्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः
प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥
क्षत्त्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः
प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥
अन्वयः
AI
'क्षतात् त्रायते' इति क्षत्त्रस्य उदग्रः शब्दः भुवनेषु रूढः किल। तद्विपरीतवृत्तेः (जनस्य) राज्येन किम्? उपक्रोशमलीमसैः प्राणैः वा (किम्)?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
क्षतादिति॥
क्षणु हिंसायाम् इति धातोः संपदादित्पात्क्विप्। गमादीनाम्(वा.४०७३) इति वक्तव्यादनुनासिकलोपे तुगागमे च क्षदिति रूपं सिद्धम्। क्षतो नाशात्त्रायत इति क्षत्त्रः। सुपि- (अष्टाध्यायी ३.२.४ ) इति योगविभागात्कः। तामेतां व्युत्पत्तिं कविरर्थतोऽनुक्रामति-क्षतादित्यादिना। उदग्र उन्नतः क्षत्त्रवर्णस्य शब्दो वाचकः। क्षत्त्रशब्द इत्यर्थः। क्षतात्त्रायत इति व्युत्पत्त्या भुवनेषु रूढः किल प्रसिद्धः। खलु। नाश्वकर्णादिवत्केवलरूढः किंतु पङ्कजादिवद्योगरूढ इत्यर्थः। ततः किमित्य आह-तस्यक्षत्त्रशब्दस्य विपरीतवृत्तेर्विरुद्धव्यापारस्य क्षतस्त्राणमकुर्वतः पुंसो राज्येन किम्? उपक्रोशमलीमसैर्निन्दामलिनैः। उपक्रोशोजुगुप्सा च कुत्सा निन्दा च गर्हणे इत्यमरः। ज्योत्स्नातमिस्रा- (अष्टाध्यायी ५.२.११४ ) इत्यादिना मलीमैसशब्दो निपातितः। मलीमसं तु मलिनं कञ्चरं मलदूषितम् इत्यमरः। तैः प्राणैर्वा किम्? निन्दितस्य सर्वं व्यर्थमित्यर्थः। एतेन एकातपत्रम्(२।४७)इत्यादिना श्लोकद्वयेनोक्तं प्रत्युक्तमिति वेदितव्यम् ॥
Summary
AI
"The noble definition of a 'Kshatriya' is famous in all worlds because 'he protects from harm.' What is the use of a kingdom, or even a life stained by public disgrace, for one whose conduct is contrary to this?"
सारांश
AI
संसार में 'क्षत्रिय' शब्द का अर्थ विनाश से रक्षा करना है। जो इस धर्म के विपरीत आचरण करे, उसके लिए ऐसे कलंकित प्राणों और राज्य का क्या प्रयोजन?
पदच्छेदः
AI
| क्षतात् | क्षत (५.१) | From harm |
| किल | किल | indeed |
| त्रायते | त्रायते (√त्रै कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | one protects |
| इति | इति | thus |
| उदग्रः | उदग्र (१.१) | the noble |
| क्षत्त्रस्य | क्षत्त्र (६.१) | of a Kshatriya |
| शब्दः | शब्द (१.१) | word (definition) |
| भुवनेषु | भुवन (७.३) | in the worlds |
| रूढः | रूढ (√रुह्+क्त, १.१) | is famous |
| राज्येन | राज्य (३.१) | with a kingdom |
| किम् | किम् (१.१) | what (is the use) |
| तद्विपरीतवृत्तेः | तत्–विपरीत–वृत्ति (६.१) | of one whose conduct is contrary to that |
| प्राणैः | प्राण (३.३) | with a life |
| उपक्रोशमलीमसैः | उपक्रोश–मलीमस (३.३) | stained by public censure |
| वा | वा | or |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | ता | त्कि | ल | त्रा | य | त | इ | त्यु | द | ग्रः |
| क्ष | त्त्र | स्य | श | ब्दो | भु | व | ने | षु | रू | ढः |
| रा | ज्ये | न | किं | त | द्वि | प | री | त | वृ | त्तेः |
| प्रा | णै | रु | प | क्रो | श | म | ली | म | सै | र्वा |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.