भक्त्या गुरौ मय्यनुकम्पया च
प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूति-
मवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥
भक्त्या गुरौ मय्यनुकम्पया च
प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूति-
मवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥
प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूति-
मवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥
अन्वयः
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पुत्र! गुरौ भक्त्या मयि अनुकम्पया च ते प्रीता अस्मि। वरम् वृणीष्व। प्रसन्नाम् माम् केवलानाम् पयसाम् प्रसूतिम् न अवेहि, (अपि तु) कामदुघाम् अवेहि।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
भक्त्येति॥ हे पुत्र! गुरौ। भक्त्या। मय्यनुकम्पया च। ते तुभ्यं प्रीताऽस्मि।
क्रियाग्रहणमपि कर्तव्यम् इति चतुर्थी। वरं देवेभ्यो वरणीयमर्थम्। देवाद्धृते वरः श्रेष्ठे त्रिषु क्लीबं मनाक्प्रिये इत्यमरः। वृणीष्व स्वीकुरु। तथा हि-मां केवलानां पयसां प्रसूतिं कारणं नावेहि न विद्धिः। किंतु प्रसन्नां माम्। कामान्दोग्धीति कामदुघा। तामवेहि। दुहः कब्थश्च (अष्टाध्यायी ३.२.७० ) इति कप्प्रत्ययः ॥
Summary
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"My son, I am pleased with you for your devotion to your guru and your compassion for me. Choose a boon. Now that I am pleased, know me not merely as a producer of milk, but as a wish-fulfilling cow."
सारांश
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नंदिनी ने कहा कि वह राजा की गुरुभक्ति और दया से प्रसन्न है, अतः वह वर माँगें। वह केवल दूध देने वाली गाय नहीं, बल्कि प्रसन्न होने पर समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाली कामधेनु है।
पदच्छेदः
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| भक्त्या | भक्ति (३.१) | By your devotion |
| गुरौ | गुरु (७.१) | to the guru |
| मयि | अस्मद् (७.१) | to me |
| अनुकम्पया | अनुकम्पा (३.१) | and by your compassion |
| च | च | and |
| प्रीता | प्रीत (√प्री+क्त, १.१) | pleased |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| ते | युष्मद् (३.१) | with you |
| पुत्र | पुत्र (८.१) | O son |
| वरम् | वर (२.१) | a boon |
| वृणीष्व | वृणीष्व (√वृ कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | choose |
| न | न | not |
| केवलानाम् | केवल (६.३) | of mere |
| पयसाम् | पयस् (६.३) | milk |
| प्रसूतिम् | प्रसूति (२.१) | as a producer |
| अवेहि | अवेहि (अव√इ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | know |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| कामदुघाम् | कामदुघ (२.१) | as a wish-fulfilling cow |
| प्रसन्नाम् | प्रसन्न (प्र√सद्+क्त, २.१) | being pleased |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | क्त्या | गु | रौ | म | य्य | नु | क | म्प | या | च |
| प्री | ता | स्मि | ते | पु | त्र | व | रं | वृ | णी | ष्व |
| न | के | व | ला | नां | प | य | सां | प्र | सू | ति |
| म | वे | हि | मां | का | म | दु | घां | प्र | स | न्नाम् |
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