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इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनु-
र्विज्ञापिता प्रीततरा बभूव ।
तदन्विता हैमवताञ्च कुक्षेः
प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ॥

अन्वयः AI इत्थम् क्षितीशेन विज्ञापिता वसिष्ठ-धेनुः प्रीततरा बभूव । तत्-अन्विता (सा) हैमवतात् कुक्षेः च अश्रमेण आश्रमम् प्रति आययौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) इत्थमिति॥ इत्थं क्षितीशेन विज्ञापिता वसिष्ठस्य धेनुः प्रीततरा पूर्वं शुश्रूषया प्रीता। संप्रत्यनया विज्ञापनया प्रीततराऽतिसंतुष्टा बभूव। तदन्विता तेन दिलीपेनान्विता हैमवताद्धिमवत्संबन्धिनः कुक्षेगुहायाः सकाशादश्रमेणानायासेनाश्रमं प्रत्याययावागता च ॥
Summary AI Thus addressed by the king, Vasishtha's cow, Nandini, became very pleased. Accompanied by him, she returned effortlessly from the Himalayan cave to the hermitage.
सारांश AI राजा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर वसिष्ठ की वह गाय राजा के साथ हिमालय की उस गुफा से बिना किसी थकावट के पुनः आश्रम लौट आई।
पदच्छेदः AI
इत्थम्इत्थम् thus
क्षितीशेनक्षितिईश (३.१) by the lord of the earth
वसिष्ठधेनुःवसिष्ठधेनु (१.१) Vasishtha's cow
विज्ञापिताविज्ञापित (वि√ज्ञा+णिच्+क्त, १.१) having been informed
प्रीततराप्रीततर (१.१) more pleased
बभूवबभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) became
तदन्वितातत्अन्वित (१.१) accompanied by him
हैमवतात्हैमवत (५.१) from the Himalayan
and
कुक्षेःकुक्षि (५.१) from the cave
प्रत्याययौप्रत्याययौ (प्रति+आ√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) returned
आश्रमम्आश्रम (२.१) to the hermitage
अश्रमेणअश्रम (३.१) without effort
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
त्थं क्षि ती शे सि ष्ठ धे नु
र्वि ज्ञा पि ता प्री रा भू
न्वि ता है ता ञ्च कु क्षेः
प्र त्या या वा श्र श्र मे
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