ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुञ्चसंश्रयै-
रसूर्यगैः सूचितभाग्यसंपदम् ।
असूत पुत्रं समये शचीसमा
त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम् ॥
ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुञ्चसंश्रयै-
रसूर्यगैः सूचितभाग्यसंपदम् ।
असूत पुत्रं समये शचीसमा
त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम् ॥
रसूर्यगैः सूचितभाग्यसंपदम् ।
असूत पुत्रं समये शचीसमा
त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम् ॥
अन्वयः
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ततः शची-समा सा समये उच्च-संश्रयैः असूर्यगैः पञ्चभिः ग्रहैः सूचित-भाग्य-संपदम् पुत्रम्, त्रि-साधना शक्तिः अक्षयम् अर्थम् इव, असूत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ग्रहैरिति॥ ततः शच्येन्द्राण्या समा।
पुलोमजा शचीन्द्राणी इत्यमरः (अमरकोशः १.१.५५ ) । सा सुदक्षिणा समये प्रसूतिकाले सति। दशमे मासीत्यर्थः। दशमे मासि जायते इति श्रुतिः। उच्ञ्चसंश्रयैरुञ्चसंस्थैस्तुङ्गस्थानगैरसूर्यगैरनस्तमितैः कैश्चिद्यथासंभवं पञ्चभिर्ग्रहैः सूचिता भाग्यसंपद्यस्य तं पुत्रम्। त्रीणि प्रभावमन्त्रोत्साहात्मकानि साधनान्युत्पादकानि यस्याः सा त्रिसाधना शक्तिः। शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साहमन्त्त्रजाः इत्यमरः (अमरकोशः १.१.५५ ) । अक्षयमर्थमिव। असूत। षूङ् प्राणिगर्भविमोचने इत्यात्मनेपदिषु पठ्यते। तस्माद्धातोः कर्तरि लङ्। अत्रेदमनुसंधेयम्-अजवृषभमृगाङ्गनाकुलीरा झषवणिजौ च दिवाकरादितुङ्गाः। दशशिखिमनुयुक्तिथीन्द्रियांशैस्त्त्रिनवकविंशतिभिश्च तेऽस्तनीचाः॥(बृ.जा.) इति। सूर्यादीनां सप्तानां ग्रहाणां मेषवृषभादयो राशयः श्लोकोक्तक्रमविशिष्टा उञ्चस्थानानि। स्वस्वतुङ्गापेक्षया सप्तमस्थस्थानानि च नीचानि। तत्रोञ्चेष्वपि दशमादयो राशित्रिंशांशा यथाक्रममुञ्चेषु परमोञ्चा नीचेषु परमनीचा इति जातकश्लोकार्थः। अत्रांशस्त्त्रिंशो भागः। यथाह नारदः-त्रिंशद्भागात्मकं लग्नम् इति। सूर्यप्रत्यासत्तिर्ग्रहाणामस्तमयो नाम्। तदुक्तं लघुजातके-रविणास्तमयो योगो वियोगस्तूदयो भवेत् इति। ते च स्वोञ्चस्थाः फलान्ति नास्तगा नापि नीचगाः। तदुक्तं राजमृगाङ्के-स्वोञ्चे पूर्णं स्वर्क्षकेऽर्धं सुहृद्भे पादं द्विङ्भेऽल्पं शुभं खेचरेन्द्रः। नीचस्थायी नास्तगो वा न किंचित्पादं नूनं स्वत्रिकोणे ददाति॥ इति। तदिदमाह कविः-उञ्चसंश्रयैरसूर्यगैः इति च। एवं सति यस्य जन्मकाले पञ्चप्रभृतयो ग्रहाः स्वोञ्चस्थाः स एव तुङ्गो भवति। तदुक्तं कूटस्थीये-सुखिनः प्रकृष्टकार्या राजप्रतिरूपकाश्च राजानः। एकद्वित्रिचतुर्भिर्जायन्तेऽतः परं दिव्याः॥ इति। तदिदमाह-पञ्चभिरिति ॥
Summary
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Then, at the auspicious time, the queen, who was equal to Indra's wife Shachi, gave birth to a son. His immense future fortune was indicated by five planets being in their highest positions and not obscured by the sun. This was like the triple power of a king yielding an inexhaustible result.
सारांश
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जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान पर थे, तब सुदक्षिणा ने एक परम तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जैसे इंद्र की पत्नी शची ने जयंत को या शक्ति ने अक्षय फल को जन्म दिया हो।
पदच्छेदः
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| ततः | ततः | Then |
| शचीसमा | शची–समा (१.१) | she who was equal to Shachi |
| समये | समय (७.१) | at the right time |
| उच्चसंश्रयैः | उच्च–संश्रय (३.३) | by those in exalted positions |
| असूर्यगैः | असूर्यग (३.३) | not combust (with the sun) |
| पञ्चभिः | पञ्चन् (३.३) | by five |
| ग्रहैः | ग्रह (३.३) | planets |
| सूचितभाग्यसंपदम् | सूचित–भाग्य–संपद् (२.१) | one whose great fortune was indicated |
| पुत्रं | पुत्र (२.१) | a son |
| त्रिसाधना | त्रि–साधना (१.१) | the triple power (of a king) |
| शक्तिः | शक्ति (१.१) | power |
| अक्षयम् | अक्षय (२.१) | an inexhaustible |
| अर्थम् | अर्थ (२.१) | result |
| इव | इव | like |
| असूत | असूत (√सू कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्र | है | स्त | तः | प | ञ्च | भि | रु | ञ्च | सं | श्र | यै |
| र | सू | र्य | गैः | सू | चि | त | भा | ग्य | सं | प | दम् |
| अ | सू | त | पु | त्रं | स | म | ये | श | ची | स | मा |
| त्रि | सा | ध | ना | श | क्ति | रि | वा | र्थ | म | क्ष | यम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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