दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः सुखाः
प्रदक्षिणार्चिर्हविरग्निराददे ।
बभूव सर्वं शुभशंसि तत्क्षणं
भवो हि लोकाभ्युदयाय तादृशाम् ॥
दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः सुखाः
प्रदक्षिणार्चिर्हविरग्निराददे ।
बभूव सर्वं शुभशंसि तत्क्षणं
भवो हि लोकाभ्युदयाय तादृशाम् ॥
प्रदक्षिणार्चिर्हविरग्निराददे ।
बभूव सर्वं शुभशंसि तत्क्षणं
भवो हि लोकाभ्युदयाय तादृशाम् ॥
अन्वयः
AI
दिशः प्रसेदुः । सुखाः मरुतः ववुः । अग्निः प्रदक्षिण-अर्चिः (सन्) हविः आददे । तत्-क्षणं सर्वं शुभ-शंसि बभूव । हि तादृशां भवः लोक-अभ्युदयाय (भवति) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
दिश इति॥ तत्क्षणं तस्मिन्क्षणे।
कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया (अष्टाध्यायी २.३.५ ) दिशः प्रसेदुः प्रसन्ना बभूवुः। मरुतो वाताः सुखा मनोहरा ववुः। अग्निः प्रदक्षिणार्चिः सन् हविराददे स्वीचकार । इत्थँ सर्वं शुभशंसि शुभसूचकं बभूव। तथा हि-तादृशां रघुप्रकाराणां भवो जन्म लोकाभ्युदयाय। भवतीति शेषः। ततो देवा अपि संतुष्टा इत्यर्थः॥
Summary
AI
The directions became clear, pleasant winds blew, and the sacrificial fire, with its flame turning clockwise, accepted the oblation. At that moment, everything became auspicious. Indeed, the birth of such great souls is for the prosperity of the world.
सारांश
AI
पुत्र जन्म के समय दिशाएं निर्मल हो गईं, सुखद वायु चलने लगी और यज्ञ की अग्नि प्रदक्षिणा रूप में प्रज्वलित हुई; ऐसे महापुरुषों का जन्म संसार के कल्याण के लिए ही होता है।
पदच्छेदः
AI
| दिशः | दिश् (१.३) | The directions |
| प्रसेदुः | प्रसेदुः (प्र√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | became clear |
| मरुतः | मरुत् (१.३) | the winds |
| ववुः | ववुः (√वा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | blew |
| सुखाः | सुख (१.३) | pleasantly |
| प्रदक्षिणार्चिः | प्रदक्षिण–अर्चिस् (१.१) | with flame turning clockwise |
| हविः | हविस् (२.१) | the oblation |
| अग्निः | अग्नि (१.१) | the fire |
| आददे | आददे (आ√दा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | accepted |
| तत्क्षणं | तत्क्षणम् (२.१) | at that moment |
| सर्वं | सर्व (१.१) | everything |
| शुभशंसि | शुभ–शंसिन् (१.१) | auspicious |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| हि | हि | Indeed |
| तादृशाम् | तादृश (६.३) | of such (great souls) |
| भवः | भव (१.१) | the birth |
| लोकाभ्युदयाय | लोक–अभ्युदय (४.१) | for the prosperity of the world |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | शः | प्र | से | दु | र्म | रु | तो | व | वुः | सु | खाः |
| प्र | द | क्षि | णा | र्चि | र्ह | वि | र | ग्नि | रा | द | दे |
| ब | भू | व | स | र्वं | शु | भ | शं | सि | त | त्क्ष | णं |
| भ | वो | हि | लो | का | भ्यु | द | या | य | ता | दृ | शाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.