निवातपद्मस्तिमितेन चक्षुषा
नृपस्य कान्तं पिबतः सुताननम् ।
महोदधेः पूर इवेन्दुदर्शना-
द्गुरुः प्रहर्षः प्रबभूव नात्मनि ॥
निवातपद्मस्तिमितेन चक्षुषा
नृपस्य कान्तं पिबतः सुताननम् ।
महोदधेः पूर इवेन्दुदर्शना-
द्गुरुः प्रहर्षः प्रबभूव नात्मनि ॥
नृपस्य कान्तं पिबतः सुताननम् ।
महोदधेः पूर इवेन्दुदर्शना-
द्गुरुः प्रहर्षः प्रबभूव नात्मनि ॥
अन्वयः
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कान्तं सुत-आननं निवात-पद्म-स्तिमितेन चक्षुषा पिबतः नृपस्य आत्मनि, इन्दु-दर्शनात् महा-उदधेः पूरः इव, गुरुः प्रहर्षः न प्रबभूव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
निवातेति॥ निवातो निर्वातप्रदेशः।
निवातावाश्रयावातौ इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.९१ ) । तत्र यत्पद्मं तद्वत्स्तिमितेन निष्पन्देन चक्षुषा नेत्रेण कान्तं सुन्दरं सुताननं पुत्रमुखं पिबतस्तृष्णया पश्यतो नृपस्य गुरुरुत्कटः प्रहर्षः कर्ता इन्दुदर्शनाद्गुरुर्महोदधेः पूरो जलौघ इव आत्माने शरीरे न प्रबभूव स्थातुं न शशाक। अन्तर्न माति स्मेति यावत्। न ह्यल्पाधारेऽधिकं मीयत इति भावः। यद्वा, -हर्ष आत्मनि स्वस्मिन्विषये न प्रबभूव। आत्मानं नियन्तुं न शशाक। किंतु बहिर्निर्जगामेत्यर्थः॥
Summary
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As the king gazed upon his son's lovely face with an unblinking eye, steady like a lotus in a windless place, an immense joy arose that could not be contained within himself, much like the tide of the great ocean swelling at the sight of the moon.
सारांश
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पुत्र के सुंदर मुख को अपलक निहारते हुए राजा दिलीप का आनंद उसी प्रकार उमड़ पड़ा, जैसे चंद्रमा के उदय होने पर समुद्र का जल अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़ जाता है।
पदच्छेदः
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| निवातपद्मस्तिमितेन | निवात–पद्म–स्तमित (३.१) | steady like a lotus in a windless place |
| चक्षुषा | चक्षुस् (३.१) | with his eye |
| नृपस्य | नृप (६.१) | of the king |
| कान्तं | कान्त (२.१) | the lovely |
| पिबतः | पिबत् (√पा+शतृ, ६.१) | who was drinking in |
| सुताननम् | सुत–आनन (२.१) | the face of his son |
| महोदधेः | महा–उदधि (६.१) | of the great ocean |
| पूरः | पूर (१.१) | the tide |
| इव | इव | like |
| इन्दुदर्शनात् | इन्दु–दर्शन (५.१) | from the sight of the moon |
| गुरुः | गुरु (१.१) | an immense |
| प्रहर्षः | प्रहर्ष (१.१) | joy |
| प्रबभूव | प्रबभूव (प्र√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was contained |
| न | न | not |
| आत्मनि | आत्मन् (७.१) | in himself |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | वा | त | प | द्म | स्ति | मि | ते | न | च | क्षु | षा |
| नृ | प | स्य | का | न्तं | पि | ब | तः | सु | ता | न | नम् |
| म | हो | द | धेः | पू | र | इ | वे | न्दु | द | र्श | ना |
| द्गु | रुः | प्र | ह | र्षः | प्र | ब | भू | व | ना | त्म | नि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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