न संयतस्तस्य बभूव रक्षितु-
र्विसर्जयेद्यं सुतजन्महर्षितः ।
ऋणाभिधानात्स्वयमेव केवलं
तदा पितॄणां मुमुचे स बन्धनात् ॥
न संयतस्तस्य बभूव रक्षितु-
र्विसर्जयेद्यं सुतजन्महर्षितः ।
ऋणाभिधानात्स्वयमेव केवलं
तदा पितॄणां मुमुचे स बन्धनात् ॥
र्विसर्जयेद्यं सुतजन्महर्षितः ।
ऋणाभिधानात्स्वयमेव केवलं
तदा पितॄणां मुमुचे स बन्धनात् ॥
अन्वयः
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सुत-जन्म-हर्षितः रक्षितुः तस्य यं विसर्जयेत् (सः) संयतः न बभूव । तदा सः केवलं पितॄणाम् ऋण-अभिधानात् बन्धनात् स्वयम् एव मुमुचे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेति॥ रक्षितुः सम्यक्पालनशीलस्य तस्य दिलीपस्य। अत एव चौराद्यभावात्। संयतो बद्धो न बभूव नास्ति स्म। किं तेनात आह-विसर्जयेदिति॥ सुतजन्म हर्षितस्तोषितः सन्। यं बद्धं विसर्जयेद्विमोचयेत्। किंतु स राजा तदा पितॄणामृणाभिधानाद्बान्धनात् केवलमेकं यथा तथा। स्वयमेव। एक एवेत्यर्थः।
केवलः कृत्स्न एकश्च केवलश्चावधीरितः इति शाश्वतः। मुमुचे। कर्मकर्तरि लिट्। स्वयमेव मुक्त इत्यर्थः। अस्मिन्नर्थे-एष वा अनृणो यः पुत्री इति श्रुतिः प्रमाणम् ॥
Summary
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Overjoyed by his son's birth, the protector king released all his prisoners; there was none he did not set free. At that moment, he himself was automatically released from the only remaining bond: the debt owed to his ancestors.
सारांश
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राजा दिलीप के न्यायपूर्ण राज्य में कोई अपराधी बंदी नहीं था जिसे वे मुक्त करते, अतः पुत्र जन्म के अवसर पर वे स्वयं ही पितृ-ऋण के बंधन से मुक्त हो गए।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| संयतः | संयत (सं√यम्+क्त, १.१) | a prisoner |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | there was |
| रक्षितुः | रक्षितृ (६.१) | of the protector (king) |
| विसर्जयेत् | विसर्जयेत् (वि√सृज् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he would release |
| यं | यद् (२.१) | whom |
| सुतजन्महर्षितः | सुत–जन्म–हर्षित (१.१) | overjoyed by his son's birth |
| ऋणाभिधानात् | ऋण–अभिधान (५.१) | from that called a debt |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| एव | एव | indeed |
| केवलं | केवलम् (२.१) | only |
| तदा | तदा | Then |
| पितॄणाम् | पितृ (६.३) | to the ancestors |
| मुमुचे | मुमुचे (√मुच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was released |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बन्धनात् | बन्धन (५.१) | from the bond |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | सं | य | त | स्त | स्य | ब | भू | व | र | क्षि | तु |
| र्वि | स | र्ज | ये | द्यं | सु | त | ज | न्म | ह | र्षि | तः |
| ऋ | णा | भि | धा | ना | त्स्व | य | मे | व | के | व | लं |
| त | दा | पि | तॄ | णां | मु | मु | चे | स | ब | न्ध | नात् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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