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स पूर्वतः पर्वतपक्षशातनं
ददर्श देवं नरदेवसंभवः ।
पुनः पुनः सूतनिषिद्धचापलं
हरन्तमश्वं रथरश्मिसंयतम् ॥

अन्वयः AI नरदेवसंभवः सः पूर्वतः, सूतनिषिद्धचापलम् रथरश्मिसंयतम् अश्वम् पुनः पुनः हरन्तम्, पर्वतपक्षशातनम् देवम् ददर्श।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स इति॥ नरदेवसंभवः स रघुः पुनः पुनः सूतेन निषिद्धचापलं निवारितौद्धत्यं रथस्य रश्मिभिः प्रग्रहैः। किरणप्रग्रहौ रश्मी इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१४६ ) । संयतं बद्धमश्वं हरन्तं पर्वतपक्षाणां शातनं छेदकं देवमिन्द्रं पूर्वतः पूर्वस्यां दिशि ददर्श ॥
Summary AI Raghu, the son of the king, looked to the east and saw the god Indra, the cutter of the mountains' wings. Indra was leading away the horse, which was controlled by the chariot's reins, its restiveness repeatedly checked by his charioteer.
सारांश AI रघु ने पूर्व दिशा में इंद्र को देखा, जिन्होंने पूर्व में पर्वतों के पंख काटे थे। इंद्र अपने रथ की रश्मियों से बंधे उस घोड़े को बार-बार रोक रहे थे, जिसकी चंचलता को सारथि पहले ही नियंत्रित कर चुका था।
पदच्छेदः AI
सःतद् (१.१) He
पूर्वतःपूर्वतस् in the east
पर्वतपक्षशातनम्पर्वतपक्षशातन (२.१) the cutter of mountains' wings (Indra)
ददर्शददर्श (√दृश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) saw
देवम्देव (२.१) the god
नरदेवसंभवःनरदेव–संभव (१.१) the one born of a king (Raghu)
पुनःपुनर् again and
पुनःपुनर् again
सूतनिषिद्धचापलम्सूतनिषिद्धचापल (२.१) whose restiveness was checked by the charioteer
हरन्तम्हरत् (√हृ+शतृ, २.१) taking away
अश्वम्अश्व (२.१) the horse
रथरश्मिसंयतम्रथरश्मिसंयत (२.१) controlled by the chariot's reins
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
पू र्व तः र्व क्ष शा नं
र्श दे वं दे सं वः
पु नः पु नः सू नि षि द्ध चा लं
न्त श्वं श्मि सं तम्
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