मखांशभाजां प्रथमो मनीषिभि-
स्त्वमेव देवेन्द्र सदा निगद्यसे ।
अजस्रदीक्षाप्रयतस्य मद्गुरोः
क्रियाविथाताय कथं प्रवर्तसे ॥

अन्वयः AI देवेन्द्र! त्वम् एव मनीषिभिः सदा मखांशभाजाम् प्रथमः निगद्यसे। त्वम् अजस्रदीक्षाप्रयतस्य मत्गुरोः क्रियाविघाताय कथम् प्रवर्तसे?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) मखेति॥ हे देवेन्द्र! मनीषिभिस्त्वमेव मखांशभाजां यज्ञभागभुजां प्रथमः सदा निगद्यसे कथ्यसे। तथाप्यजस्रदीक्षायां नित्यदीक्षायां प्रयतस्य मद्गुरोः क्रियाविघाताय क्रतुविघाताय, क्रियां विहन्तुमित्यर्थः। तुमर्थाञ्च भाववचनात् (अष्टाध्यायी २.३.१५ ) इति चतुर्थीं। कथं प्रवर्तसे? ॥
Summary AI 'O Lord of Gods! You are always spoken of by the wise as the foremost among those who receive a share of the sacrifice. Why then do you act to obstruct the sacred rite of my father, who is purified by his constant consecration for these sacrifices?'
सारांश AI रघु ने कहा, 'हे देवेन्द्र! विद्वान आपको यज्ञ का भाग प्राप्त करने वालों में प्रथम मानते हैं। फिर आप निरंतर दीक्षा में लगे मेरे पिता के यज्ञ कार्य में बाधा क्यों उत्पन्न कर रहे हैं?'
पदच्छेदः AI
मखांशभाजाम्मखअंशभाज् (६.३) of the partakers of sacrifice shares
प्रथमःप्रथम (१.१) the first
मनीषिभिःमनीषिन् (३.३) by the wise
त्वम्युष्मद् (१.१) you
एवएव indeed
देवेन्द्रदेवइन्द्र (८.१) O Lord of Gods!
सदासदा always
निगद्यसेनिगद्यसे (नि√गद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) you are spoken of
अजस्रदीक्षाप्रयतस्यअजस्रदीक्षाप्रयत (६.१) of him who is purified by constant sacrificial consecration
मद्गुरोःमद्गुरु (६.१) of my father
क्रियाविघातायक्रियाविघात (४.१) for the obstruction of the rite
कथम्कथम् why
प्रवर्तसेप्रवर्तसे (प्र√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) do you proceed
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
खां भा जां प्र मो नी षि भि
स्त्व मे दे वे न्द्र दा नि द्य से
स्र दी क्षा प्र स्य द्गु रोः
क्रि या वि था ता थं प्र र्त से
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