त्रिलोकनाथेन सदा मखद्विष-
स्त्वया नियम्या ननु दिव्यचक्षुषा ।
स चेत्स्वयं कर्मसु धर्मचारिणां
त्वमन्तरायो भवसिच्युतोविधिः ॥

अन्वयः AI ननु त्रिलोकनाथेन दिव्यचक्षुषा त्वया मखद्विषः सदा नियम्याः। चेत् सः त्वम् स्वयम् धर्मचारिणाम् कर्मसु अन्तरायः भवसि, तर्हि विधिः च्युतः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) त्रिलोकेति॥ त्रयाणां लोकानां नाथस्त्त्रिलोकनाथः। तद्धितार्थ- (अष्टाध्यायी २.१.५१ ) इत्यादिनोत्तरपदसमासः। तेन त्रैलोक्यनियामकेन दिव्यचक्षुषाऽःतीन्द्रियार्थदर्शिना त्वया मखद्विषः क्रतुविघातकाः सदा नियम्या ननु शिक्ष्याखलु। स त्वं धर्मचारिणां कर्मसु क्रतुषु स्वयमन्तरायो विघ्नो भवसि चेत्। विधिरनुष्ठानं च्युतः क्षतः। लोके सत्कर्मकथैवास्तमियादित्यर्थः॥
Summary AI 'Surely, as the lord of the three worlds with divine sight, you are meant to always restrain the enemies of sacrifice. If you yourself become an obstacle in the righteous actions of the virtuous, then the very law of duty is violated.'
सारांश AI रघु ने आगे कहा कि तीनों लोकों के स्वामी और दिव्य दृष्टि वाले होने के नाते आपको यज्ञ में विघ्न डालने वालों को रोकना चाहिए। यदि आप स्वयं ही धर्म कार्यों में बाधा बनेंगे, तो धर्म का नियम ही नष्ट हो जाएगा।
पदच्छेदः AI
त्रिलोकनाथेनत्रिलोकनाथ (३.१) by the lord of the three worlds
सदासदा always
मखद्विषःमखद्विष् (१.३) the enemies of sacrifice
त्वयायुष्मद् (३.१) by you
नियम्याःनियम्य (नि√यम्+यत्, १.३) are to be restrained
ननुननु surely
दिव्यचक्षुषादिव्यचक्षुस् (३.१) with divine sight
सःतद् (१.१) that very
चेत्चेत् if
स्वयम्स्वयम् yourself
कर्मसुकर्मन् (७.३) in the actions
धर्मचारिणाम्धर्मचारिन् (६.३) of the righteous
त्वम्युष्मद् (१.१) you
अन्तरायःअन्तराय (१.१) an obstacle
भवसिभवसि (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) you become
च्युतःच्युत (√च्यु+क्त, १.१) violated
विधिःविधि (१.१) the law
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
त्रि लो ना थे दा द्वि
स्त्व या नि म्या नु दि व्य क्षु षा
चे त्स्व यं र्म सु र्म चा रि णां
त्व न्त रा यो सि च्यु तो वि धिः
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