क्रमेण निस्तीर्य च दोहदव्यथां
प्रचीयमानावयवा रराज सा ।
पुराणपत्रापगमादनन्तरं
लतेव संनद्धमनोज्ञपल्लवा ॥

अन्वयः AI क्रमेण दोहद-व्यथाम् निस्तीर्य च सा प्रचीयमान-अवयवा (सती), पुराण-पत्र-अपगमात् अनन्तरम् सन्नद्ध-मनोज्ञ-पल्लवा लता इव, रराज ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) क्रमेणेति॥ सा सुदक्षिणा क्रमेण दोहदव्यथां च निस्तीर्य प्रचीयमानावयवा पुष्यमाणावयवा सती। पुराणपत्राणामपगमान्नाशादनन्तरं संनद्धाः संजाताः प्रत्यग्रत्बान्मनोज्ञाः पल्लवा यस्याः सा लतेव। रराज ॥
Summary AI Gradually overcoming the distress of her pregnancy cravings, she, with her limbs filling out, shone beautifully. She was like a creeper that, after shedding its old leaves, becomes adorned with charming new sprouts.
सारांश AI गर्भ की प्रारंभिक पीड़ा बीतने पर सुदक्षिणा के अंग पुष्ट होने लगे और वे पुराने पत्तों के झड़ने के बाद नवीन कोमल पत्तों से युक्त किसी सुंदर लता के समान सुशोभित हुईं।
पदच्छेदः AI
क्रमेणक्रम (३.१) gradually
निस्तीर्यनिस्तीर्य (निस्√तृ+ल्यप्) having crossed over
and
दोहदव्यथांदोहदव्यथा (२.१) the distress of pregnancy cravings
प्रचीयमानावयवाप्रचीयमान (प्र√चि+शानच्)अवयव (१.१) she whose limbs were filling out
रराजरराज (√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) shone
सातद् (१.१) she
पुराणपत्रापगमादनन्तरंपुराण–पत्रअपगम (५.१)अनन्तरम् after the departure of old leaves
लतेवलता (१.१)इव like a creeper
संनद्धमनोज्ञपल्लवासन्नद्धमनोज्ञपल्लव (१.१) adorned with charming new sprouts
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
क्र मे नि स्ती र्य दो व्य थां
प्र ची मा ना वा रा सा
पु रा त्रा मा न्त रं
ते सं द्ध नो ज्ञ ल्ल वा
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