अन्वयः
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यथा चन्द्रः प्रह्लादनात् (अन्वर्थः), यथा तपनः प्रतापात् (अन्वर्थः), तथा एव सः राजा प्रकृतिरञ्जनात् अन्वर्थः अभूत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यथेति॥ यथा चन्दयत्याह्लादयतीति चन्द्र इन्दुः। चदिधातोरौणादिकोरप्रत्ययः। प्रह्लादनादाह्लादकरणादन्वर्थोऽनुगतार्थनामकोऽभूत्। यथा च तपतीति तपनः सूर्यः। नन्द्यादित्वाल्ल्युप्रत्ययः। प्रतापात् संतापजननादन्वर्थः। तथैव स राजा प्रकृतिरञ्जनादन्वर्थः सार्थकराजशब्दोऽभूत्। यद्यपि
राज शब्दो राजतेर्दीप्त्यर्थात्कनिन्प्रत्ययान्तो न तु रञ्जेस्तथापि धातूनामनेकार्थत्वाद्रञअजनाद्राजेत्युक्तं कविना ॥
Summary
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Just as the moon is true to its name ('delighter') by giving delight, and the sun ('scorcher') by its heat, so too did he become a true 'Raja' (king) by pleasing his 'prakriti' (subjects).
सारांश
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जैसे आनंद देने से चंद्रमा और प्रताप से सूर्य सार्थक हैं, वैसे ही प्रजा को प्रसन्न रखने से रघु का 'राजा' नाम सार्थक हुआ।
पदच्छेदः
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| यथा | यथा | just as |
| प्रह्लादनात् | प्रह्लादन (५.१) | from causing delight |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| प्रतापात् | प्रताप (५.१) | from majesty |
| तपनः | तपन (१.१) | the sun |
| यथा | यथा | just as |
| तथा | तथा | so |
| एव | एव | indeed |
| सः | तत् (१.१) | he |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| अन्वर्थः | अन्वर्थ (१.१) | true to his name |
| राजा | राजन् (१.१) | king |
| प्रकृतिरञ्जनात् | प्रकृति–रञ्जन (५.१) | from pleasing the subjects |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | था | प्र | ह्ला | द | ना | ञ्च | न्द्रः |
| प्र | ता | पा | त्त | प | नो | य | था |
| त | थै | व | सो | ऽभू | द | न्व | र्थो |
| रा | जा | प्र | कृ | ति | र | ञ्ज | नात् |
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