अन्वयः
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इन्द्रः वार्षिकम् धनुः संजहार, रघुः जैत्रम् (धनुः) दधौ । हि तौ प्रजार्थसाधने पर्यायेण उद्यतकार्मुकौ (आस्ताम्) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वार्षिकमिति॥ इन्द्रः। वर्षासु भवं वार्षिकम्, वर्षानिमित्तमित्यर्थः।
वर्षाभ्यष्ठक् (अष्टाध्यायी ४.३.१८ ) इति ठक्प्रत्ययः। धनुः संजहार। रघुर्जैत्रं जयशीलम्। जेतृशब्दात्तृन्नन्तात् प्रज्ञादिभ्यश्च (अष्टाध्यायी ५.४.३८ ) इति स्वार्थेऽण्प्रत्ययः। धनुर्दधौ। हि यस्मात् ताविन्द्ररघू प्रजानामर्थस्य प्रयोजनस्य वृष्टिविजयलक्षणस्य साधने विषये पर्यायेणोद्यते कार्मुके याभ्यां तौ पर्यायोद्यतकार्मुकौ। पर्यायोद्यमविश्रमौ इति पाठान्तरे पर्यायेणोद्यमो विश्रमश्च ययोस्तौ पर्यायोद्यमविश्रमौ। द्वयोः पर्यायकरणादक्लेशः इति भावः ॥
Summary
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Indra withdrew his seasonal bow (the rainbow), while Raghu wielded his victorious one. Indeed, for the welfare of the people, those two held their bows aloft in succession.
सारांश
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इंद्र ने अपना धनुष समेट लिया और रघु ने विजय हेतु धनुष उठाया; प्रजा के हित के लिए वे दोनों बारी-बारी से धनुष धारण करते थे।
पदच्छेदः
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| वार्षिकम् | वार्षिक (२.१) | the rainy season's |
| संजहार | संजहार (सम्√हृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | withdrew |
| इन्द्रः | इन्द्र (१.१) | Indra |
| धनुः | धनुस् (२.१) | bow |
| जैत्रम् | जैत्र (२.१) | victorious |
| रघुः | रघु (१.१) | Raghu |
| दधौ | दधौ (√धा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wielded |
| प्रजार्थसाधने | प्रजा–अर्थ–साधन (७.१) | in achieving the welfare of the subjects |
| तौ | तत् (१.२) | those two |
| हि | हि | indeed |
| पर्यायोद्यतकार्मुकौ | पर्याय–उद्यत–कार्मुक (१.२) | with bows raised in turn |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | र्षि | कं | सं | ज | हा | रे | न्द्रो |
| ध | नु | र्जै | त्रं | र | घु | र्द | धौ |
| प्र | जा | र्थ | सा | ध | ने | तौ | हि |
| प | र्या | यो | द्य | त | का | र्मु | कौ |
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