अन्वयः
AI
तदा प्रसादसुमुखे तस्मिन् विशदप्रभे चन्द्रे च, द्वयोः (विषये) चक्षुष्मताम् प्रीतिः समरसा आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रसादेति॥ प्रसादेन सुमुखे तस्मिन् रघौ विशदप्रभे निर्मलकान्तौ चन्द्रे च द्वयोर्विषये तदा चक्षुष्मतां प्रीतिरनुरागः समरसा समस्वादा। तुल्यभोगेति यावत्।
रसो गन्धे रसः स्वादे इति विश्वः। आसीत्॥
Summary
AI
At that time, the delight of the people was equally intense towards both: towards King Raghu, whose face was radiant with grace, and towards the moon, which was brilliant with clear light.
सारांश
AI
प्रसन्न मुख वाले रघु और निर्मल कांति वाले चंद्रमा, इन दोनों को देखकर प्रजा को एक समान सुख और आनंद प्राप्त हुआ।
पदच्छेदः
AI
| प्रसादसुमुखे | प्रसाद–सुमुख (७.१) | on him whose face was pleasant with grace |
| तस्मिन् | तत् (७.१) | on him |
| चन्द्रे | चन्द्र (७.१) | on the moon |
| च | च | and |
| विशदप्रभे | विशद–प्रभ (७.१) | on the one with clear light |
| तदा | तदा | then |
| चक्षुष्मताम् | चक्षुष्मत् (६.३) | of those with eyes |
| प्रीतिः | प्रीति (१.१) | the delight |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| समरसा | समरस (१.१) | of equal intensity |
| द्वयोः | द्वि (६.२) | towards the two |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सा | द | सु | मु | खे | त | स्मिं |
| श्च | न्द्रे | च | वि | श | द | प्र | भे |
| त | दा | च | क्षु | ष्म | तां | प्री | ति |
| रा | सी | त्स | म | र | सा | द्व | योः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.