अन्वयः
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तदीयानाम् यशसाम् विभूतयः इव हंसश्रेणीषु तारासु कुमुद्वत्सु वारिषु च पर्यस्ताः (आसन्) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
हंसेति॥ हंसानां श्रेणीषु पङ्क्तिषु। तारासु नक्षत्रेषु। कुमुदानि येषु सन्तीति कुमुद्वन्ति।
कुमुद्वान्कुमुदप्राये इत्यमरः (अमरकोशः २.१.१० ) । कुमुदनडवेतसेभ्यो ड्यतुप् (अष्टाध्यायी ४.२.८७ ) । तेषु। कुमुदप्रायेष्वित्यर्थः। वारिषु च तदीयानां रघुसंबन्धिनां यशसां विभूतयः संपदः पर्यस्ता इव प्रसारिताः किम् ? इत्युत्प्रेक्षा। अन्यथा कथमेषां धवलिमेति भावः॥
Summary
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His glories seemed to be scattered everywhere: in the lines of swans, in the stars, and in the waters adorned with water-lilies, as if they were manifestations of his widespread fame.
सारांश
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हंसों, नक्षत्रों और कुमुदयुक्त जल में राजा रघु का श्वेत यश ही चारों ओर वैभव के रूप में फैला हुआ दिखाई देता था।
पदच्छेदः
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| हंसश्रेणीषु | हंस–श्रेणी (७.३) | in the lines of swans |
| तारासु | तारा (७.३) | in the stars |
| कुमुद्वत्सु | कुमुद्वत् (७.३) | in the waters having water-lilies |
| च | च | and |
| वारिषु | वारि (७.३) | in the waters |
| विभूतयः | विभूति (१.३) | manifestations |
| तदीयानाम् | तदीय (६.३) | of his |
| पर्यस्ताः | पर्यस्त (परि√अस्+क्त, १.३) | were scattered |
| यशसाम् | यशस् (६.३) | of fame |
| इव | इव | as if |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हं | स | श्रे | णी | षु | ता | रा | सु |
| कु | मु | द्व | त्सु | च | वा | रि | षु |
| वि | भू | त | य | स्त | दी | या | नां |
| प | र्य | स्ता | य | श | सा | मि | व |
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