अन्वयः
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महौजसः कुम्भयोनेः उदयात् अम्भः प्रससाद । रघोः अभिभवाशङ्कि द्विषताम् मनः चुक्षुभे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रससादेति॥ महौजसः कुम्भयोनेरगस्त्यस्य।
अगस्त्यः कुम्भसंभवः इत्यमरः। उदयादम्भः प्रससाद प्रसन्नं बभूव। महौजसो रघोरुदयादभिभवाशङ्कि द्विषतां मनश्चुक्षुभे कालुष्यं प्राप। अगस्त्योदये जलानि प्रसीदन्ति इत्यमरः॥
Summary
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Just as the water becomes clear at the rising of the mighty Agastya (the star Canopus), the minds of Raghu's enemies, fearing his rise to power, became agitated.
सारांश
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अगस्त्य मुनि के उदय से जल तो निर्मल हो गया, किन्तु राजा रघु के आक्रमण की आशंका से शत्रुओं के मन व्याकुल हो उठे।
पदच्छेदः
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| प्रससाद | प्रससाद (प्र√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became clear |
| उदयात् | उदय (५.१) | from the rising |
| अम्भः | अम्भस् (१.१) | water |
| कुम्भयोनेः | कुम्भयोनि (६.१) | of the pot-born (Agastya) |
| महौजसः | महौजस् (६.१) | of the very powerful |
| रघोः | रघु (६.१) | of Raghu |
| अभिभवाशङ्कि | अभिभव–आशङ्किन् (१.१) | fearing defeat |
| चुक्षुभे | चुक्षुभे (√क्षुभ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was agitated |
| द्विषताम् | द्विषत् (६.३) | of the enemies |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | स | सा | दो | द | या | द | म्भः |
| कु | म्भ | यो | ने | र्म | हौ | ज | सः |
| र | घो | र | भि | भ | वा | श | ङ्कि |
| चु | क्षु | भे | द्वि | ष | तां | म | नः |
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