अन्वयः
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काकुत्स्थः तत्र द्विषाम् नाराचदुर्दिनम् विषह्य सत् मङ्गल स्नातः इव जयश्रियम् प्रतिपेदे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
द्विषामिति॥ काकुत्स्थो रघुस्तत्र महेन्द्राद्रौ द्विषां नाराचदुर्दिनं नाराचानां बाणाविशेषाणां दुर्दिनम्। लक्षणया वर्षमुच्यते। विषह्य सहित्वा सद्यथाशास्त्त्रं मङ्गलस्नात इव विजयमङ्गलार्थमभिषिक्त इव जयश्रियं प्रतिपेदे प्राप।
यत्तु सर्वौषधिस्नानं तन्माङ्गल्यमुदीरितम्इति यादवः ॥
Summary
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Having endured the shower of iron arrows from his enemies, Raghu (Kakutstha) attained the glory of victory, as if he had just taken a sacred, auspicious bath after a sacrifice.
सारांश
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रघु ने शत्रुओं के बाणों की वर्षा को सहकर, मंगल स्नान के बाद प्राप्त होने वाली विजय लक्ष्मी को अत्यंत गौरव के साथ प्राप्त किया।
पदच्छेदः
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| काकुत्स्थः | काकुत्स्थ (१.१) | The descendant of Kakutstha (Raghu), |
| तत्र | तत्र | there, |
| द्विषाम् | द्विष् (६.३) | of the enemies |
| नाराचदुर्दिनम् | नाराच–दुर्दिन (२.१) | the bad day of iron arrows (a shower of arrows) |
| विषह्य | विषह्य (वि√सह्+ल्यप्) | having endured, |
| सत्-मङ्गल-स्नातः | सत्–मङ्गल–स्नात (√स्नात+क्त, १.१) | one who has taken an auspicious purificatory bath |
| इव | इव | like, |
| जयश्रियम् | जय–श्री (२.१) | the glory of victory |
| प्रतिपेदे | प्रतिपेदे (प्रति√पद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attained. |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वि | षां | वि | ष | ह्य | का | कु | त्स्थ |
| स्त | त्र | ना | रा | च | दु | र्दि | नम् |
| स | न्म | ङ्ग | ल | स्ना | त | इ | व |
| प्र | ति | पे | दे | ज | य | श्रि | यम् |
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