अन्वयः
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अदृश्या पद्मा स्वयम् किल छायामण्डललक्ष्येण पद्मातपत्रेण साम्राज्यदीक्षितम् तम् भेजे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
छायेति॥ अत्र रघोस्तेजोविशेषेण स्वयं संनिहितया लक्ष्म्या छत्रधारणं कृतमित्युत्प्रेक्षते-पद्मा लक्ष्मीः।
लक्ष्मीः पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिप्रिया इत्यमरः (अमरकोशः १.१.३१ ) । सा स्वयमदृश्या किल। किल इति संभावनायाम्। सती छायामण्डललक्ष्येण कान्तिपुञ्जानुमेयेन। न तु स्वरूपतो दृश्येन। छायामण्डलम् इत्यनेनानातपज्ञानं लक्ष्यते। छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः इत्युभयत्राप्यमरः। पद्मातपत्रेण पद्ममेवातपत्रं तेन कारणभूतेन साम्राज्यदीक्षितं साम्राज्ये साम्राज्यकर्मणि मण्डलाधिपत्ये दीक्षितमभिषिक्तं तं भेजे। अन्यथा कथमेतादृशी कान्तिसंपत्तिरिति भावः ॥
Summary
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The goddess Padma (Lakshmi), herself unseen, served him who was consecrated for sovereignty, under the pretext of the royal white parasol, which was discernible only by the circle of its shadow.
सारांश
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साम्राज्य के पद पर अभिषिक्त रघु की साक्षात लक्ष्मी ने अदृश्य रहकर कमल रूपी छत्र की छाया से सेवा की।
पदच्छेदः
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| छायामण्डललक्ष्येण | छाया–मण्डल–लक्ष्य (३.१) | by the pretext of the circle of its shadow |
| तम् | तत् (२.१) | him |
| अदृश्या | अदृश्य (१.१) | unseen |
| किल | किल | indeed |
| स्वयम् | स्वयम् | herself |
| पद्मा | पद्मा (१.१) | the goddess Lakshmi |
| पद्मातपत्रेण | पद्म–आतपत्र (३.१) | by the lotus-umbrella |
| भेजे | भेजे (√भज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | served |
| साम्राज्यदीक्षितम् | साम्राज्य–दीक्षित (२.१) | consecrated for sovereignty |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| छा | या | म | ण्ड | ल | ल | क्ष्ये | ण |
| त | म | दृ | श्या | कि | ल | स्व | यम् |
| प | द्मा | प | द्मा | त | प | त्रे | ण |
| मे | जे | सा | म्रा | ज्य | दी | क्षि | तम् |
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