अन्वयः
AI
सरस्वती च काले काले बन्दिषु परिकल्पितसांनिध्या (सती) अर्थ्याभिः स्तुतिभिः स्तुत्यम् (तम्) उपतस्थे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
परिकल्पितेति॥ सरस्वती च काले काले सर्वेष्वपि योग्यकालेषु।
नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी ८.१.४ ) इति वीप्सायां द्विर्वचनम्। बन्दिषु परिकल्पितसांनिध्या कृतसंनिधाना सती स्तुत्यं स्तोत्रार्हं तं रघुम्। अर्थ्याभिरर्थादनपेताभिः। धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते (अष्टाध्यायी ४.४.९२ ) इति यत्प्रत्ययः। स्तुतिभिः स्तोत्रैः। उपतस्थे। देवताबुद्ध्या पूजितवतीत्यर्थः। देवतात्वं च-ना विष्णुः वृथिवीपतिः इति वा लोकपालात्मकत्वाद्वेत्यनुसंधेयम्। एवं च सतिउपाद्देवपूजासंगतिकरणमित्रकरणपथिषु(वा.९१४) इति वक्तव्यादात्मनेपदं सिद्ध्यति॥
Summary
AI
The goddess Saraswati, manifesting her presence in the bards from time to time, also attended upon the praiseworthy Raghu with meaningful hymns of praise.
सारांश
AI
उचित समय पर वंदीजनों की वाणी में निवास कर देवी सरस्वती ने अर्थपूर्ण स्तुतियों द्वारा रघु की वंदना की।
पदच्छेदः
AI
| परिकल्पितसांनिध्या | परिकल्पित–सांनिध्य (१.१) | she whose presence was arranged |
| काले | काल (७.१) | time |
| काले | काल (७.१) | to time |
| च | च | and |
| बन्दिषु | बन्दिन् (७.३) | in the bards |
| स्तुत्यम् | स्तुत्य (√स्तु+ण्यत्, २.१) | the praiseworthy one |
| स्तुतिभिः | स्तुति (३.३) | with praises |
| अर्थ्याभिः | अर्थ्य (३.३) | meaningful |
| उपतस्थे | उपतस्थे (उप√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | worshipped |
| सरस्वती | सरस्वती (१.१) | the goddess Saraswati |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | क | ल्पि | त | सां | नि | ध्या |
| का | ले | का | ले | च | ब | न्दि | षु |
| स्तु | त्यं | स्तु | ति | भि | र | र्थ्या | भि |
| रु | प | त | स्थे | स | र | स्व | ती |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.