अन्वयः
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चरताम् वाहानाम् गात्र-शिञ्जितैः वर्मभिः पवन-उद्धूत-राजताली-वन-ध्वनिः अभ्यभूयत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अभ्यभूयतेति॥ चरतां गच्छतां वाहानां वाजिनां,
वाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.४४ ) । गात्रशिञ्जितैर्गात्रेषु शब्दायमानैः। कर्तरि क्तः। गात्रसञ्जितैः इति वा पाठः। सञ्जतेर्ण्यन्तात्कर्मणि क्तः। वर्मभिः कवचैः। मर्मरैः इति पाठे वाहानां गात्रशिञअजितैर्गात्रध्वनिभिरित्यर्थः। मर्मरो मर्मरायमाण इति ध्वनेर्विंशेषणम्। पवनेनोद्धूतानां कम्पितानां राजतालीवनानां ध्वनिरभ्यभूयत तिरस्कृतः ॥
Summary
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The sound of the royal palm groves rustling in the wind was drowned out by the jingling of the armor on the bodies of the moving horses.
सारांश
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चलते हुए घोड़ों के शरीर के हिलते हुए कवचों की झंकार ने वायु के वेग से झूमते हुए ताड़ के वनों की ध्वनि को भी फीका कर दिया।
पदच्छेदः
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| अभ्यभूयत | अभ्यभूयत (अभि√भू भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was overpowered |
| वाहानाम् | वाह (६.३) | of the horses |
| चरताम् | चरत् (√चर्+शतृ, ६.३) | moving, |
| गात्र-शिञ्जितैः | गात्र–शिञ्जित (३.३) | by the jingling on the limbs |
| वर्मभिः | वर्मन् (३.३) | of the armors, |
| पवन-उद्धूत-राजताली-वन-ध्वनिः | पवन–उद्धूत (उद्√धू+क्त)–राजताली–वन–ध्वनि (१.१) | the sound of the royal palm groves shaken by the wind. |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भ्य | भू | य | त | वा | हा | नां |
| च | र | तां | गा | त्र | शि | ञ्जि | तैः |
| व | र्म | भिः | प | व | नो | द्धू | त |
| रा | ज | ता | ली | व | न | ध्व | निः |
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