अन्वयः
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राम-अभ्यर्थितः उदन्वान् रामाय अवकाशम् ददौ किल। (सः एव उदन्वान्) अपरान्त-महीपाल-व्याजेन रघवे करम् ददौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अवकाशमिति॥ उदन्वानुदधी रामाय जामदग्न्याय। अभ्यर्थितो याचितः सन्। अवकाशं स्थानं ददौ किल।
किल इति प्रसिद्धौ। रघवे त्वपरान्तमहीपालव्याजेन करं बलिं ददौ। बलिहस्तांशवः कराः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१७२ ) । अपरान्तानां समुद्रमध्यदेशवर्तित्वात्तैर्दत्ते करे समुद्रदत्तत्वोपचारः। करदानं च भीत्या, न तु याञ्चयेति रामाद्रघोरुत्कर्षः ॥
Summary
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The ocean, which, when requested by Parashurama, had once given him land, now gave tribute to Raghu under the pretext of it being offered by the kings of the Aparanta region.
सारांश
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जिस समुद्र ने पूर्व में परशुराम की प्रार्थना पर उन्हें स्थान दिया था, उसी ने अब अपरान्त राजाओं के बहाने रघु को कर अर्पित किया।
पदच्छेदः
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| अवकाशम् | अवकाश (२.१) | space/land |
| किल | किल | indeed, |
| उदन्वान् | उदन्वत् (१.१) | the ocean, |
| राम-अभ्यर्थितः | राम–अभ्यर्थित (अभि√अर्थ्+क्त, १.१) | requested by Rama (Parashurama), |
| ददौ | ददौ (√दा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gave. |
| अपरान्त-महीपाल-व्याजेन | अपरान्त–महीपाल–व्याज (३.१) | Under the pretext of the kings of Aparanta, |
| रघवे | रघु (४.१) | to Raghu |
| करम् | कर (२.१) | tribute. |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व | का | शं | को | लो | द | न्वा |
| न्रा | मा | या | भ्य | र्थि | तो | द | दौ |
| अ | प | रा | न्त | म | ही | पा | ल |
| व्या | जे | न | र | घ | वे | क | रम् |
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