अन्वयः
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सः अकालजलदोदयः अब्जानाम् बालातपम् इव यवनीमुखपद्मानाम् मधुमदम् न सेहे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यवनीति॥ स रघुर्यवनीनां यवनस्त्त्रीणाम्।
जातेरस्त्त्रीविषयादयोपधात् (अष्टाध्यायी ४.१.६३ ) इति ङीष्। मुखानि पद्मानीव मुखपद्मानि। उपमितसमासः। तेषां मधुना मद्येन यो मदो मदरागः। कार्यकारणभावयोरभेदेन निर्देशः। तं न सेहे। कमिव? अकाले प्रावृड्व्यतिरिक्ते काले जलदोदयः। प्रायेण प्रावृषि पद्मविकाशस्याप्रसक्तत्वादब्जानां संबन्धिनं बालातपमिव। अब्जहितत्वादब्जसंबन्धित्वं सौरातपस्य ॥
Summary
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He (Raghu) could not bear the intoxication from wine on the lotus-like faces of the Yavana women, just as the rise of an untimely cloud cannot tolerate the morning sunlight on lotuses.
सारांश
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जैसे असमय आए बादलों का उदय कमलों के बाल-आतप को सहन नहीं करता, वैसे ही रघु ने यवन स्त्रियों के मुख-कमलों के मदिरा-जनित मद को सहन नहीं किया।
पदच्छेदः
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| यवनीमुखपद्मानाम् | यवनी–मुख–पद्म (६.३) | of the lotus-like faces of the Yavana women |
| सेहे | सेहे (√सह् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | tolerated |
| मधुमदम् | मधु–मद (२.१) | the intoxication from wine |
| न | न | not |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बालातपम् | बाल–आतप (२.१) | the morning sunlight |
| इव | इव | like |
| अब्जानाम् | अब्ज (६.३) | of the lotuses |
| अकालजलदोदयः | अकाल–जलद–उदय (१.१) | the rise of an untimely cloud |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | व | नी | मु | ख | प | द्मा | नां |
| से | हे | म | धु | म | दं | न | सः |
| बा | ला | त | प | मि | वा | ब्जा | ना |
| म | का | ल | ज | ल | दो | द | यः |
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