अन्वयः
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तद्योधाः आस्तीर्णाजिनरत्नासु द्राक्षावलयभूमिषु मधुभिः विजयश्रमं विनयन्ते स्म।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विनयन्त इति॥ तस्य रघोर्योधा भटा आस्तीर्णान्यजिनरत्नानि चर्मश्रेष्टानि यासु तासु द्राक्षावलयानां भूमिषु।
मृद्विका गोस्तनी द्राक्षा स्वाद्वी मधुरसेति च इत्यमरः। मधुभिर्द्राक्षाफलप्रकृतिकैर्मद्यैर्विजयश्रमं युद्धखेदं विनयन्ते स्मापनीतवन्तः। कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि (अष्टाध्यायी १.३.३७ ) इत्यात्मनेपदम्। लट् स्मे (अष्टाध्यायी ३.२.११८ ) इति भूतार्थे लट् ॥
Summary
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His warriors dispelled their fatigue from the victory by drinking wine in the vineyards, on grounds where precious animal skins were spread.
सारांश
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रघु के सैनिकों ने अंगूर की लताओं से घिरी भूमि पर श्रेष्ठ मृगछाले बिछाकर मदिरापान के साथ अपनी विजय की थकान मिटाई।
पदच्छेदः
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| विनयन्ते | विनयन्ते (वि√नी कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | dispelled |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| तद्योधाः | तद्–योध (१.३) | his warriors |
| मधुभिः | मधु (३.३) | with wines |
| विजयश्रमम् | विजय–श्रम (२.१) | the fatigue of victory |
| आस्तीर्णाजिनरत्नासु | आस्तीर्ण–अजिन–रत्न (७.३) | on which precious animal skins were spread |
| द्राक्षावलयभूमिषु | द्राक्षा–वलय–भूमि (७.३) | in the grounds of the vineyards |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | न | य | न्ते | स्म | त | द्यो | धा |
| म | धु | भि | र्वि | ज | य | श्र | मम् |
| आ | स्ती | र्णा | जि | न | र | त्ना | सु |
| द्रा | क्षा | व | ल | य | भू | मि | षु |
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