ततः प्रतस्थे कौबेरीं भास्वानिव रघुर्दिशम् ।
शरैरुस्रैरिवोदीच्यानुद्धरिष्यन् रसानिव ॥

अन्वयः AI ततः रघुः उदीच्यान् शरैः उद्धरिष्यन्, भास्वान् उस्रैः रसान् इव, कौबेरीं दिशं प्रतस्थे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तत इति॥ ततो रघुर्भास्वान् सूर्य इव शरैर्बाणैरुस्रैः किरणैरिव। किरणोस्रमयूखांशुगभस्तघृणिरश्मयः इत्यमरः। उदीच्यानुदग्भवान्नृपान् रसानुदकानीवोद्धरिष्यन् कौबेरीं कुबेरसंबन्धिनीं दिशमुदीचीं प्रतस्थे। अनेकेवशब्देनेयमुपमा। यथाह दण्डी-एकानेकेवशब्दत्वात्सा वाक्यार्थोपमा द्विधा इति ॥
Summary AI Then Raghu set out for the northern direction, intending to conquer the northerners with his arrows, just as the sun moves north to draw out the earth's waters with its rays.
सारांश AI जैसे सूर्य उत्तर दिशा की ओर जाता है, वैसे ही रघु ने उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया, ताकि वे अपने बाणों रूपी किरणों से उत्तर के राजाओं का धन वैसे ही निकाल सकें जैसे सूर्य जल सोखता है।
पदच्छेदः AI
ततःततः then
प्रतस्थेप्रतस्थे (प्र√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) set out
कौबेरीम्कौबेरी (२.१) northern (direction of Kubera)
भास्वान्भास्वत् (१.१) the sun
इवइव like
रघुःरघु (१.१) Raghu
दिशम्दिश् (२.१) direction
शरैःशर (३.३) with arrows
उस्रैःउस्र (३.३) with rays
इवइव like
उदीच्यान्उदीच्य (२.३) the northerners
उद्धरिष्यन्उद्धरिष्यत् (उद्√हृ+शतृ, १.१) intending to extract/conquer
रसान्रस (२.३) the waters/essence
इवइव like
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
तः प्र स्थे कौ बे रीं
भा स्वा नि घु र्दि शम्
रै रु स्रै रि वो दी च्या
नु द्ध रि ष्य न्र सा नि
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