अन्वयः
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तस्य विनीताध्वश्रमाः वाजिनः सिन्धुतीरविचेष्टनैः स्कन्धात् लग्नकुङ्कुमकेसरान् दुधुवुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विनीतेति॥ सिन्धुर्नाम काश्मीरदेशेषु कश्चिन्नदविशेषः।
देशे नदविशेषेऽब्धेः सिन्धुर्ना सरिति स्त्त्रियाम् इत्यमरः। सिन्धोस्तीरे विचेष्टनैरङ्गपरिवर्तनैर्विनीताध्वश्रमास्तस्य रघोर्वाजिनोऽश्वा लग्नाः कुङ्कुमकेसराः कुङ्कुमकुसुमकिञ्जल्का येषां तान्। यद्वा, -लग्नकुङ्कुमाः केसराः सटा येषां तान्। अथ कुङ्कुमम्। काश्मीरजन्म इत्यमरः। केसरो नामकेसरे। तुरंगसिंहयोः स्कन्धकेशेषु बहुलद्रुमे। पुंनागवृक्षे किञ्जल्के स्यात् इति हैमः। स्कन्धान् कायान्। स्कन्धः प्रकाण्डे कायेंऽसे विज्ञानादिषु पञ्चसु। नृपे समूहे व्यूहे च इति हैमः। दुधुवुः कम्पयन्ति स्म ॥
Summary
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His horses, their journey-fatigue relieved by rolling on the banks of the Indus river, shook from their manes the saffron filaments that had clung to them.
सारांश
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सिंधु नदी के तट पर लोटने से मार्ग की थकान मिटाते हुए रघु के घोड़ों ने अपने अयाल झटके, जिससे उनके बालों में चिपके हुए केसर के रेशे झड़ गए।
पदच्छेदः
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| विनीताध्वश्रमाः | विनीत–अध्वश्रम (१.३) | whose journey-fatigue was removed |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| सिन्धुतीरविचेष्टनैः | सिन्धु–तीर–विचेष्टन (३.३) | by rolling on the banks of the Indus |
| दुधुवुः | दुधुवुः (√धु कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | shook off |
| वाजिनः | वाजिन् (१.३) | the horses |
| स्कन्धात् | स्कन्ध (५.१) | from their manes/shoulders |
| लग्नकुङ्कुमकेसरान् | लग्न–कुङ्कुम–केसर (२.३) | the stuck saffron filaments |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | नी | ता | ध्व | श्र | मा | स्त | स्य |
| सि | न्धु | ती | र | वि | चे | ष्ट | नैः |
| दु | धु | वु | र्वा | जि | नः | स्क | न्धा |
| ल्ल | ग्न | कु | ङ्कु | म | के | स | रान् |
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