अन्वयः
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तेषां सदश्वभूयिष्ठाः तुङ्गाः द्रविणराशयः उपदा (भूत्वा) शश्वत् न उत्सेकाः (सन्त:) कोसलेश्वरं विविशुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तेषामिति॥ तेषां काम्बोजानां सद्भिरश्वैर्भूयिष्ठा बहुलास्तुङ्गा द्रविणानां हिरण्यानाम्।
हिरण्यं द्रविणं द्युम्नम् इत्यमरः (अमरकोशः २.९.९० ) । राशय एवोपदा उपायनानि। उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा इत्यमरः (अमरकोशः २.८.२८ ) । कोसलेश्वरं कोसलदेशाधिपतिं तं रघुं शश्वदसकृद्विविशुः। मुहुः पुनः पुनः शश्वदभीक्ष्णमसकृत्समाः इत्यमरः (अमरकोशः ३.४.१ ) । तथाप्युत्सेका गर्वास्तु न विविशुः। सत्यपि गर्पकारणे न जगर्वेत्यर्थः ॥
Summary
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Their vast heaps of wealth, abundant with fine horses, entered the treasury of the lord of Kosala as tribute, yet this did not make him arrogant.
सारांश
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काम्बोजों द्वारा भेंट किए गए उत्तम घोड़ों और अपार धन-संपत्ति ने रघु के कोष को भर दिया, किंतु इस महान उपलब्धि से उनके मन में रत्ती भर भी अहंकार नहीं आया।
पदच्छेदः
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| तेषाम् | तद् (६.३) | their |
| सदश्वभूयिष्ठाः | सदश्व–भूयिष्ठ (१.३) | abundant with fine horses |
| तुङ्गाः | तुङ्ग (१.३) | vast |
| द्रविणराशयः | द्रविण–राशि (१.३) | heaps of wealth |
| उपदा | उपदा (१.१) | as tribute |
| विविशुः | विविशुः (√विश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | entered |
| शश्वत् | शश्वत् | always |
| न | न | not |
| उत्सेकाः | उत्सेक (१.३) | arrogant |
| कोसलेश्वरम् | कोसल–ईश्वर (२.१) | the lord of Kosala |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | षां | स | द | श्व | भू | यि | ष्ठा |
| स्तु | ङ्गा | द्र | वि | ण | रा | श | यः |
| उ | प | दा | वि | वि | शुः | श | श्व |
| न्नो | त्से | काः | को | स | ले | श्व | रम् |
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