अन्वयः
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सः अस्य रुद्धार्कम् अधारावर्षदुर्दिनम् रथवर्त्मरजः अपि न प्रसेहे, पताकिनीम् कुतः एव (प्रसहेत)?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेति॥ स प्राग्ज्योतिषेश्वरो रुद्धार्कमावृतसूर्यम्। अधारावर्षं च तद्दुर्दिनं च धारावृष्टिं विना दुर्दिनीभूतम्। अस्य रघो रथवर्त्मरजोऽपि न प्रसेहे। पताकिनीं सेनां तु कुत एव प्रसेहे? न कुतोऽपीत्यर्थः ॥
Summary
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The king of Pragjyotisha could not even endure the dust from the path of Raghu's chariots, which created a gloomy day by obscuring the sun like a rain of dust. How then could he possibly face Raghu's entire army?
सारांश
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वह राजा रघु के रथों के मार्ग से उड़ने वाली उस धूल को भी सहन न कर सका जिसने सूर्य को ढककर अंधकार कर दिया था, तो वह उनकी विशाल सेना का सामना भला कैसे करता।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| प्रसेहे | प्रसेहे (प्र√सह् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | could endure |
| स | तद् (१.१) | he |
| रुद्धार्कमधारावर्षदुर्दिनम् | रुद्ध (√रुद्ध+क्त)–अर्क–अधारा–वर्ष–दुर्दिन (२.१) | a gloomy day of dust-rain obscuring the sun |
| रथवर्त्मरजः | रथ–वर्त्म–रजस् (२.१) | the dust from the chariot path |
| अपि | अपि | even |
| अस्य | इदम् (६.१) | his (Raghu's) |
| कुतः | कुतः | how |
| एव | एव | indeed |
| पताकिनीम् | पताकिनी (२.१) | the army |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | प्र | से | हे | स | रु | द्धा | र्क |
| म | धा | रा | व | र्ष | दु | र्दि | नम् |
| र | थ | व | र्त्म | र | जो | ऽप्य | स्य |
| कु | त | ए | व | प | ता | कि | नीम् |
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