अन्वयः
AI
सः सर्वस्वदक्षिणम् विश्वजितम् यज्ञम् आजह्रे। हि सताम् आदानम् वारिमुचाम् इव विसर्गाय (भवति)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ स रघुः सर्वस्वं दक्षिणा यस्य तं सर्वस्वदक्षिणम्।
विश्वजित्सर्वस्वदक्षिणःइति श्रुतेः। विश्वजितं नाम यज्ञमाजह्ने। कृतवानित्यर्थः। युक्तं चैतदित्याह-सतां साधूनाम्। वारिमुचां मेघानामिव। आदानमर्जनं विसर्गाय त्यागाय हि। पात्रविनियोगायेत्यर्थः॥
Summary
AI
Raghu performed the Vishvajit sacrifice, in which the fee was all his possessions. For, the accumulation of wealth by the virtuous is for giving it away, just as clouds gather water only to rain it down.
सारांश
AI
रघु ने 'विश्वजित' यज्ञ किया जिसमें अपना सर्वस्व दान कर दिया जाता है; क्योंकि सज्जनों द्वारा धन का संचय बादलों की भांति केवल दूसरों को देने के लिए ही होता है।
पदच्छेदः
AI
| सः | तद् (१.१) | he |
| विश्वजितम् | विश्वजित् (२.१) | the Vishvajit |
| आजह्रे | आजह्रे (आ√हृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | performed |
| यज्ञम् | यज्ञ (२.१) | sacrifice |
| सर्वस्वदक्षिणम् | सर्वस्व–दक्षिण (२.१) | in which all possessions are the sacrificial fee |
| आदानम् | आदान (१.१) | the act of taking |
| हि | हि | for |
| विसर्गाय | विसर्ग (४.१) | for giving away |
| सताम् | सत् (६.३) | of the virtuous |
| वारिमुचाम् | वारि–मुच् (६.३) | of the clouds |
| इव | इव | like |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वि | श्व | जि | त | मा | ज | ह्ने |
| य | ज्ञं | स | र्व | स्व | द | क्षि | णम् |
| आ | दा | नं | हि | वि | स | र्गा | य |
| स | तां | वा | रि | मु | चा | मि | व |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.