सत्रान्ते सचिवसखः पुरस्क्रियाभि-
र्गुर्वीभिः शमितपराजयव्यलीकान् ।
काकुत्स्थश्चिरविरहोत्सुकावरोधान्
राजन्यान्स्वपुरनिवृत्तयेऽनुमेने ॥
सत्रान्ते सचिवसखः पुरस्क्रियाभि-
र्गुर्वीभिः शमितपराजयव्यलीकान् ।
काकुत्स्थश्चिरविरहोत्सुकावरोधान्
राजन्यान्स्वपुरनिवृत्तयेऽनुमेने ॥
र्गुर्वीभिः शमितपराजयव्यलीकान् ।
काकुत्स्थश्चिरविरहोत्सुकावरोधान्
राजन्यान्स्वपुरनिवृत्तयेऽनुमेने ॥
अन्वयः
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सत्रान्ते सचिवसखः काकुत्स्थः गुर्वीभिः पुरस्क्रियाभिः शमितपराजयव्यलीकान् चिरविरहोत्सुकावरोधान् राजन्यान् स्वपुरनिवृत्तये अनुमेने।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सत्रान्त इति॥ काकुत्स्थो रघुः सत्रान्ते यज्ञान्ते।
सत्रमाच्छादने यज्ञे सदादाने धनेऽपि च इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१ ) । सचिवानाममात्यानां सखेति सचिवसखः सन्। सचिवो भृतकेऽमात्ये इति हैमः। तेषामत्यन्तानुसरणद्योतनार्थं राज्ञः सखित्वव्यपदेशः। राजाहःसखिभ्यष्टच् (अष्टाध्यायी ५.४.९१ ) गुर्वीभिर्महतीभिः। गुरुर्महत्याङ्गिरसे पित्रादौ धर्मदेशके इति हैमः। पुरस्क्रियाभिः पूजाभिः शमितं पराजयेन व्यलीकं दुःखं वैलक्ष्यं वा येषां तान्। दुःखे वैलक्ष्ये व्यलीकम् इति यादवः। चिरविरहेणोत्सुका उत्कण्ठिता अवरोधा अन्तःपुराङ्गना येषां तान्। राज्ञोऽपत्यानि राजन्याः क्षत्रियाः। तान्। राजश्वशुराद्यत् (अष्टाध्यायी ४.१.१३७ ) इत्यपत्यार्थे यत्प्रत्ययः। मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट् इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१ ) । स्वपुरं प्रतिनिवृत्तये प्रतिगमनायानुमेनेऽनुज्ञातवान् । प्रहर्षिणीवृत्तमेतत्। तदुक्तम्-म्नौ ज्रौ गस्त्त्रिदशयतिः प्रहर्षिणीयम्इति ॥
Summary
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At the end of the sacrifice, Kakutstha (Raghu), who considered his ministers as friends, gave leave to the vassal kings to return to their own cities. He honored them greatly, soothing the pain of their past defeat, and acknowledged that their queens were anxious due to the long separation.
सारांश
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यज्ञ की समाप्ति पर मंत्रियों के साथ रघु ने पराजित राजाओं का उचित सम्मान कर उनके मन से पराजय का दुख मिटा दिया और उन्हें अपने नगरों को लौटने की अनुमति दी।
पदच्छेदः
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| सत्रान्ते | सत्र–अन्त (७.१) | at the end of the sacrifice |
| सचिवसखः | सचिव–सखि (१.१) | one whose friends are his ministers |
| पुरस्क्रियाभिः | पुरस्क्रिया (३.३) | with honors |
| गुर्वीभिः | गुर्वी (३.३) | great |
| शमितपराजयव्यलीकान् | शमित (√शमित+णिच्+क्त)–पराजय–व्यलीक (२.३) | those whose pain from defeat was pacified |
| काकुत्स्थः | काकुत्स्थ (१.१) | Kakutstha (Raghu) |
| चिरविरहोत्सुकावरोधान् | चिर–विरह–उत्सुक–अवरोध (२.३) | those whose harems were anxious from long separation |
| राजन्यान् | राजन्य (२.३) | the kings |
| स्वपुरनिवृत्तये | स्व–पुर–निवृत्ति (४.१) | for the return to their own cities |
| अनुमेने | अनुमेने (अनु√मन् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave leave |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त्रा | न्ते | स | चि | व | स | खः | पु | र | स्क्रि | या | भि |
| र्गु | र्वी | भिः | श | मि | त | प | रा | ज | य | व्य | ली | कान् |
| का | कु | त्स्थ | श्चि | र | वि | र | हो | त्सु | का | व | रो | धा |
| न्रा | ज | न्या | न्स्व | पु | र | नि | वृ | त्त | ये | ऽनु | मे | ने |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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