तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं
मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे ।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा
प्राप्तोऽसि संभावयितुं वनान्माम् ॥
तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं
मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे ।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा
प्राप्तोऽसि संभावयितुं वनान्माम् ॥
मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे ।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा
प्राप्तोऽसि संभावयितुं वनान्माम् ॥
अन्वयः
AI
अर्हतः तव अभिगमेन मे मनः न तृप्तम्, (अपितु) नियोगक्रियया उत्सुकम्। शासितुः आज्ञया वा आत्मना वा माम् वनात् संभावयितुम् प्राप्तः असि अपि?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तवेति॥ अर्हतः पूज्यस्य प्रशंस्यस्य।
अर्हः प्रशंसायाम् (अष्टाध्यायी ३.२.११३ ) इति शतृप्रत्ययः। तवाभिगमेनागमनमात्रेण मे मनो न तृप्तं न तुष्टम्। किंतु नियोगक्रिययाऽऽज्ञाकरणेनोत्सुकं सोत्कण्ठम्। इष्टार्थोद्युक्त उत्सुकः इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.९ ) । प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च (अष्टाध्यायी २.३.४४ ) इति सप्तम्यर्थे तृतीया। शासितुर्गुरोराज्ञयाप्यात्मना स्वतो वा। प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्(वा.१४६६) इति तृतीया। मां संभावयितुं वनात्प्राप्तोऽसि? गुर्वर्थं स्वार्थं वाऽऽगमनमित्यर्थः॥
Summary
AI
"My mind is not satisfied by your mere arrival, worthy one; it is eager to carry out a command for you. Have you come from the forest to honor me, either by the command of your preceptor or of your own accord?"
सारांश
AI
आपके आगमन से मैं कृतार्थ हूँ। क्या आप गुरु की आज्ञा से आए हैं या स्वयं मुझ पर अनुग्रह करने वन से यहाँ पधारे हैं? मेरा मन आपकी सेवा हेतु उत्सुक है।
पदच्छेदः
AI
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अर्हतः | अर्हत् (√अर्हत्+शतृ, ६.१) | of you, the worthy one |
| न | न | not |
| अभिगमेन | अभिगमन (३.१) | by the mere arrival |
| तृप्तं | तृप्त (√तृप्त+क्त, १.१) | satisfied |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
| नियोगक्रियया | नियोग–क्रिया (३.१) | by the act of (fulfilling) a command |
| उत्सुकं | उत्सुक (१.१) | eager |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| अपि | अपि | (question particle) |
| आज्ञया | आज्ञा (३.१) | by the command |
| शासितुः | शासितृ (६.१) | of the preceptor |
| आत्मना | आत्मन् (३.१) | by yourself |
| वा | वा | or |
| प्राप्तः | प्राप्त (प्र√आप्+क्त, १.१) | arrived |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| संभावयितुं | संभावयितुम् (सम्√भू+णिच्+तुमुन्) | to honor |
| वनात् | वन (५.१) | from the forest |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | वा | र्ह | तो | ना | भि | ग | मे | न | तृ | प्तं |
| म | नो | नि | यो | ग | क्रि | य | यो | त्सु | कं | मे |
| अ | प्या | ज्ञ | या | शा | सि | तु | रा | त्म | ना | वा |
| प्रा | प्तो | ऽसि | सं | भा | व | यि | तुं | व | ना | न्माम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.