सर्वत्र नो वार्तमवेहि राज-
न्नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम् ।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टेः
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्रा ॥
सर्वत्र नो वार्तमवेहि राज-
न्नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम् ।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टेः
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्रा ॥
न्नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम् ।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टेः
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्रा ॥
अन्वयः
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राजन्! सर्वत्र नः वार्तम् अवेहि। त्वयि नाथे (सति) प्रजानाम् अशुभं कुतः (भवेत्)? सूर्ये तपति (सति) तमिस्रा लोकस्य दृष्टेः आवरणाय कथं कल्पेत?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सर्वत्रेति॥ हे राजन्! त्वं सर्वत्र नोऽस्माकं वार्तं स्वास्थ्यमवेहि जानीहि।
वार्तं वल्गुन्यरोगे च इत्यमरः (अमरकोशः १.८.३ ) । वार्तं पाटवमारोग्यं भव्यं स्वास्थ्यमनामयम् इति यादवः। न चैतदाश्चर्यमित्याह-नाथ इति। त्वयि नाथ ईश्वरे सति प्रजानामशुभं दुःखं कुतः? तथा हि-अर्थान्तरं न्यस्यति सूर्य इत्यादिना। सूर्ये तपति प्रकाशमाने सति तमिस्रा तमस्ततिः। तमिस्रं तिमिरं रोगे तमिस्रा तु समस्ततौ । कृष्णपक्षे निशायां च इति विश्वः। तमिस्रम् इति पाठे तमिस्रं तिमिरम्। तमिस्रं तिमिरं तमः इत्यमरः (अमरकोशः १.८.३ ) । लोकस्य जनस्य। लोकस्तु भुवने जने इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२ ) । दृष्टेरावरणाय कथं कल्पेत? दृष्टिमावरितुं नालमित्यर्थः। क्लृपेरलमर्थत्वात्तद्योगे नमःस्वस्ति- (अष्टाध्यायी २.३.१६ ) इत्यादिना चतुर्थी। अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम् इति भगवान्भाष्यकारः। कल्पेत। संपद्येत। न कल्पत इत्यर्थः। क्लृपि संपद्यमाने चतुर्थी (वा.१४५९) इति वक्तव्यात् ॥
Summary
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Kautsa tells King Raghu, "O King, know that we are well everywhere. With you as our protector, how can any misfortune befall the people? When the sun is shining, how can darkness possibly serve to cover the sight of the world?"
सारांश
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कौत्स ने कहा कि आपके जैसा रक्षक होने पर प्रजा का अमंगल असंभव है। सूर्य के प्रकाशमान होने पर अंधकार लोगों की दृष्टि को कैसे रोक सकता है?
पदच्छेदः
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| सर्वत्र | सर्वत्र | everywhere |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
| वार्तम् | वार्त (२.१) | well-being |
| अवेहि | अवेहि (अव√इ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | know |
| राजन् | राजन् (८.१) | O King |
| नाथे | नाथ (७.१) | as protector |
| कुतः | कुतः | from where |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in you |
| अशुभम् | अशुभ (१.१) | misfortune |
| प्रजानाम् | प्रजा (६.३) | of the subjects |
| सूर्ये | सूर्य (७.१) | when the sun |
| तपति | तपत् (√तपत्+शतृ, ७.१) | is shining |
| आवरणाय | आवरण (४.१) | for covering |
| दृष्टेः | दृष्टि (६.१) | of sight |
| कल्पेत | कल्पेत (√कृप् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | can be capable |
| लोकस्य | लोक (६.१) | of the world |
| कथम् | कथम् | how |
| तमिस्रा | तमिस्रा (१.१) | darkness |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र्व | त्र | नो | वा | र्त | म | वे | हि | रा | ज |
| न्ना | थे | कु | त | स्त्व | य्य | शु | भं | प्र | जा | नाम् |
| सू | र्ये | त | प | त्या | व | र | णा | य | दृ | ष्टेः |
| क | ल्पे | त | लो | क | स्य | क | थं | त | मि | स्रा |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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