स्थाने भवानेकनराधिपः
सन्नकिंचनत्वं मखजं व्यनक्ति ।
पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः
कलाक्षयः श्लाघ्यतरो हि वृद्धेः ॥
स्थाने भवानेकनराधिपः
सन्नकिंचनत्वं मखजं व्यनक्ति ।
पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः
कलाक्षयः श्लाघ्यतरो हि वृद्धेः ॥
सन्नकिंचनत्वं मखजं व्यनक्ति ।
पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः
कलाक्षयः श्लाघ्यतरो हि वृद्धेः ॥
अन्वयः
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एकनराधिपः सन् भवान् मखजम् अकिंचनत्वं व्यनक्ति इति स्थाने। हि सुरैः पर्यायपीतस्य हिमांशोः कलाक्षयः वृद्धेः श्लाघ्यतरः भवति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स्थान इति॥ भवानेकनराधिपः सार्वभौमः सन्। मखजं मखजन्यम्। न विद्यते किंचन यस्येत्यकिंचनः। मयूरव्यंसकादित्वात्तत्पुरुषः। तस्य भावस्तत्त्वं निर्धनत्वं व्यनक्ति प्रकटयति। स्थाने युक्तम्।
युक्ते द्वे सांप्रतं स्थाने इत्यमरः । तथा हि-सुरैर्देवैः पर्यायेण क्रमेण पीतस्य हिमांशोः कलाक्षयो वृद्धेरुपचयाच्छ्लाघ्यतरो हि वरः खलु। मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेति निहतो मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः। क्रलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चिर्थिषु नृपाः॥ (भर्तृ.२।४४) इति भावः। अत्र कामन्दकः-धर्मार्थं क्षीणकोशस्य क्षीणत्वमपि शोभते। सुरैः पीतावशेषस्य कृष्णपक्षे विधोरिव ॥ इति ॥
Summary
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"It is fitting that you, though the sole monarch of men, display a poverty born of sacrifice. Indeed, the waning of the moon, whose nectar is drunk in turns by the gods, is more praiseworthy than its waxing."
सारांश
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यज्ञ के कारण आपकी यह निर्धनता अत्यंत गौरवशाली है। देवताओं द्वारा अमृत पी लेने के बाद चंद्रमा की घटती कलाएँ उसकी पूर्णता से अधिक शोभा पाती हैं।
पदच्छेदः
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| स्थाने | स्थाने | It is fitting |
| भवान् | भवत् (१.१) | you |
| एकनराधिपः | एक–नर–अधिप (१.१) | the sole monarch of men |
| सन् | सत् (√अस्+शतृ, १.१) | being |
| अकिंचनत्वम् | अकिंचनत्व (२.१) | poverty |
| मखजम् | मख–ज (२.१) | born of sacrifice |
| व्यनक्ति | व्यनक्ति (वि√अन्ज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | displays |
| पर्यायपीतस्य | पर्याय–पीत (६.१) | of that which is drunk in turns |
| सुरैः | सुर (३.३) | by the gods |
| हिमांशोः | हिमांशु (६.१) | of the moon |
| कलाक्षयः | कला–क्षय (१.१) | the waning of the digits |
| श्लाघ्यतरः | श्लाघ्यतर (१.१) | is more praiseworthy |
| हि | हि | indeed |
| वृद्धेः | वृद्धि (५.१) | than the waxing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्था | ने | भ | वा | ने | क | न | रा | धि | पः | स |
| न्न | किं | च | न | त्वं | म | ख | जं | व्य | न | क्ति |
| प | र्या | य | पी | त | स्य | सु | रै | र्हि | मां | शोः |
| क | ला | क्ष | यः | श्ला | घ्य | त | रो | हि | वृ | द्धेः |
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