स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वा-
त्पात्रे निधायार्ध्यमनर्घशीलः ।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेयः ॥
स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वा-
त्पात्रे निधायार्ध्यमनर्घशीलः ।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेयः ॥
त्पात्रे निधायार्ध्यमनर्घशीलः ।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेयः ॥
अन्वयः
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वीतहिरण्मयत्वात् मृण्मये पात्रे अर्घ्यम् निधाय, अनर्घशीलः यशसा प्रकाशः आतिथेयः सः श्रुतप्रकाशम् अतिथिम् प्रत्युज्जगाम।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ अनर्घशीलोऽमूल्यस्वभावः। असाधारणस्वभाव इत्यर्थः।
मूल्ये पूजाविधआवर्धः इति। शीलं स्वभावे सद्वृत्ते इति चामरशाश्वतौ। यशसा कीर्त्या। प्रकाशत इति प्रकाशः। पचाद्यच्। अतिथिषु साधुरातिथएयः। पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ (अष्टाध्यायी ४.४.१०४ ) इति ढञ्। स रघुः। हिरण्यस्य विकारो हिरण्मयम्। दाण्डिनायन- (अष्टाध्यायी ६.४.१७४ ) आदिसूत्रेण निपातः। वीतहिरण्मयत्वादपगतसुवर्णपात्रत्वात्। यज्ञस्य सर्वस्वदक्षिणाकत्वादिति भावः। मृण्मये मृद्विकारे पात्रे। अर्घार्थमिदमर्घअयम्। पादार्घाभ्यां च (अष्टाध्यायी ५.४.२५ ) इति यत्। पूजार्थं द्रव्यं निधआय श्रुतेन शास्त्त्रेण प्रकाशं प्रसिद्धम्। श्रूयत इति श्रुतं वेदशास्त्त्रम्।श्रुतं शास्त्त्रावधृतयोः इत्यमरः (अमरकोशः २.७.३६ ) । अतिथिमभ्यागतं कौत्सम्। अतिथिर्ना गृहागते इत्यमरः (अमरकोशः २.७.३६ ) । प्रत्युज्जगाम ॥
Summary
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Raghu, the hospitable one, whose character was priceless and who was himself illustrious through fame, went forth to receive the guest Kautsa, who was renowned for his learning. Due to the absence of golden vessels, Raghu placed the water of respectful offering in an earthen pot.
सारांश
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स्वर्णपात्रों के अभाव में मिट्टी के पात्र में अर्घ्य लेकर यशस्वी और दानशील राजा रघु ने शास्त्रवेत्ता अतिथि कौत्स का भावपूर्ण स्वागत किया।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he (Raghu) |
| मृण्मये | मृण्मय (७.१) | in an earthen |
| वीतहिरण्मयत्वात् | वीत–हिरण्मयत्व (५.१) | due to the absence of golden ones |
| पात्रे | पात्र (७.१) | vessel |
| निधाय | निधाय (नि√धा+ल्यप्) | having placed |
| अर्घ्यम् | अर्घ्य (२.१) | the water of respectful offering |
| अनर्घशीलः | अनर्घ–शील (१.१) | one of priceless character |
| श्रुतप्रकाशम् | श्रुत–प्रकाश (२.१) | one famous for his learning |
| यशसा | यशस् (३.१) | by fame |
| प्रकाशः | प्रकाश (१.१) | the illustrious one |
| प्रत्युज्जगाम | प्रत्युज्जगाम (प्रति+उद्√गम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went forth to receive |
| अतिथिम् | अतिथि (२.१) | the guest |
| आतिथेयः | आतिथेय (१.१) | the hospitable one |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | मृ | ण्म | ये | वी | त | हि | र | ण्म | य | त्वा |
| त्पा | त्रे | नि | धा | या | र्ध्य | म | न | र्घ | शी | लः |
| श्रु | त | प्र | का | शं | य | श | सा | प्र | का | शः |
| प्र | त्यु | ज्ज | गा | मा | ति | थि | मा | ति | थे | यः |
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