तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञ-
स्तपोधनं मानधनाग्रयायी ।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारा-
त्कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच ॥
तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञ-
स्तपोधनं मानधनाग्रयायी ।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारा-
त्कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच ॥
स्तपोधनं मानधनाग्रयायी ।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारा-
त्कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच ॥
अन्वयः
AI
विधिज्ञः मानधनाग्रयायी कृत्यवित् विशांपतिः तम् तपोधनम् विधिवत् अर्चयित्वा आरात् विष्टरभाजम् (तम् प्रति) कृताञ्जलिः (सन्) इति उवाच।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तमिति॥ विधिज्ञः शास्त्त्रज्ञः। अकरणे प्रत्यवायभीरुरित्यर्थः। मानधनानामग्रयाय्यग्रेसरः। अपयशोभीरुरित्यर्थः। कृत्यवित् कार्यज्ञः। आगमन प्रयोजनमवश्यं प्रष्टव्यमिति कृत्यवित्। विशांपतिर्मनुजेश्वरः।
द्वौ विशौ वैश्यमनुजौ इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२२५ ) । विष्टरभाजमासनगतम्। उपविष्टमित्यर्थः। विष्टरो विटपी दर्भमुष्टिः पीठाद्यमासनम् इत्यमरः। वृक्षासनयोर्विष्टरः (अष्टाध्यायी ८.३.९३ ) इति निपातः। तं तपोधनं विधिवद्विध्यर्हम्। यथाशास्त्त्रमित्यर्थः। तदर्हम् (अष्टाध्यायी ५.१.११७ ) इति वतिप्रत्ययः। अर्चयित्वा। आरात् समीपे। आराद्दूरसमीपयोः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२२५ ) । कृताञ्जलिः सन्। इति वक्ष्यमाणप्रकारेणोवाच ॥
Summary
AI
The lord of the people, Raghu—knower of rites, foremost among those who hold honor as wealth, and aware of his duties—worshipped the ascetic Kautsa according to tradition. Then, with folded hands, he spoke thus to the guest who was seated nearby on a seat of grass.
सारांश
AI
शास्त्रविधि के ज्ञाता और विनम्र राजा रघु ने तपस्वी कौत्स का पूजन किया और उनके आसन ग्रहण करने पर हाथ जोड़कर उनका कुशल-क्षेम पूछा।
पदच्छेदः
AI
| तम् | तद् (२.१) | him |
| अर्चयित्वा | अर्चयित्वा (√अर्च+णिच्+क्त्वा) | having worshipped |
| विधिवत् | विधिवत् | according to rule |
| विधिज्ञः | विधि–ज्ञ (१.१) | the knower of rites |
| तपोधनम् | तपस्–धन (२.१) | one whose wealth is austerity |
| मानधनाग्रयायी | मान–धन–अग्रयायिन् (१.१) | foremost among those whose wealth is honor |
| विशांपतिः | विश्–पति (१.१) | the lord of the people |
| विष्टरभाजम् | विष्टर–भाज् (२.१) | one occupying a seat of grass |
| आरात् | आरात् | near |
| कृताञ्जलिः | कृत–अञ्जलि (१.१) | one who has folded his hands |
| कृत्यवित् | कृत्य–विद् (१.१) | the knower of duty |
| इति | इति | thus |
| उवाच | उवाच (√वच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | म | र्च | यि | त्वा | वि | धि | व | द्वि | धि | ज्ञ |
| स्त | पो | ध | नं | मा | न | ध | ना | ग्र | या | यी |
| वि | शां | प | ति | र्वि | ष्ट | र | भा | ज | मा | रा |
| त्कृ | ता | ञ्ज | लिः | कृ | त्य | वि | दि | त्यु | वा | च |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.