जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ
द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ ।
गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥
जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ
द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ ।
गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥
द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ ।
गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥
अन्वयः
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गुरु-प्रदेयात् अधिके निःस्पृहः अर्थी, अर्थि-कामात् अधिक-प्रदः नृपः च, तौ द्वौ अपि साकेत-निवासिनः जनस्य अभिनन्द्य-सत्त्वौ अभूताम्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
जनस्येति॥ तावर्थि-दातारौ द्वावपि साकेतनिवासिनोऽयोध्यावासिनः।
साकेतः स्यादयोध्यायां कोसला नन्दिनी च सा इति यादवः। जनस्याभिनन्द्यसत्त्वौ स्तुत्यव्यवसायावभूताम्। द्रव्यासुव्यवसायेषु सत्त्वमस्त्री तु जन्तुषु इत्यमरः। कौ द्वौ? गुरुप्रदेयादधिकेऽतिरिक्तद्रव्ये निःस्पृहोऽर्थी। अर्थिकामादर्थिमनोरथादधिकं प्रददातीति तथोक्तः। प्रे दाज्ञः। (अष्टाध्यायी ३.२.६ ) इति कप्रत्ययः। नृपश्च ॥
Summary
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Both of them became objects of admiration for the people of Saketa: the supplicant (Kautsa), who was indifferent to anything more than his guru's fee, and the king (Raghu), who gave more than the supplicant had desired.
सारांश
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अयोध्यावासी उन दोनों की ही प्रशंसा करने लगे—वह याचक जो गुरु दक्षिणा से अधिक कुछ नहीं चाहता था और वह राजा जो याचक की माँग से भी अधिक देने वाला था।
पदच्छेदः
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| जनस्य | जन (६.१) | of the people |
| साकेतनिवासिनः | साकेत–निवासिन् (६.१) | dwelling in Saketa |
| तौ | तद् (१.२) | those two |
| द्वौ | द्वि (१.२) | both |
| अपि | अपि | also |
| अभूताम् | अभूताम् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) | became |
| अभिनन्द्यसत्त्वौ | अभिनन्द्य–सत्त्व (१.२) | those whose character was to be praised |
| गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहः | गुरुप्रदेय–अधिक–निःस्पृह (१.१) | indifferent to more than what was to be given to the guru |
| अर्थी | अर्थिन् (१.१) | the supplicant |
| नृपः | नृप (१.१) | the king |
| अर्थिकामादधिकप्रदः | अर्थिकाम–अधिक–प्रद (१.१) | and the giver of more than the supplicant's desire |
| च | च | and |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | न | स्य | सा | के | त | नि | वा | सि | न | स्तौ |
| द्वा | व | प्य | भू | ता | म | भि | न | न्द्य | स | त्त्वौ |
| गु | रु | प्र | दे | या | धि | क | निः | स्पृ | हो | ऽर्थी |
| नृ | पो | ऽर्थि | का | मा | द | धि | क | प्र | द | श्च |
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