वृन्ताच्छ्लथं हरति पुष्पमनोकहानां
संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः ।
स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः
सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥
वृन्ताच्छ्लथं हरति पुष्पमनोकहानां
संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः ।
स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः
सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥
संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः ।
स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः
सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥
अन्वयः
AI
विभात-वायुः ते मुख-मारुतस्य स्वाभाविकं सौरभ्यं पर-गुणेन (वर्धयितुम्) ईप्सुः इव, अनोकहानां वृन्तात् श्लथं पुष्पं हरति, अरुण-अंशु-भिन्नैः सरसिजैः संसृज्यते च ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वृन्तादिति॥ विभातवायुः प्रभातवायुः स्वाभाविकं नैसर्गितं ते तव मुखमारुतस्य निःश्वासपवनस्य सौरभ्यम्। तादृक्सौगन्ध्यमित्यर्थः। परगुणेनान्यदीयगुणेन। सांक्रामिकगन्धेनेत्यर्थः। ईप्सुराप्नुमिच्छुरिव।
आप्ज्ञप्यृधामीत् (अष्टाध्यायी ७.४.५५ ) इतीकारादेशः। अनोकहानां वृक्षाणां श्लथं शिथिलं पुष्पं वृन्तात् प्रसवबन्धनात्। वृन्तं प्रसवबन्धनम् इत्यमरः (अमरकोशः २.४.१५ ) । हरत्यादत्ते। अरुणांशुभिन्नैस्तरणिकिरणोद्बोधितैः सरसि जातैः सरसिजैः कमलैः सह। तत्पुरुषे कृति बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इति सप्तम्या अलुक्। संसृज्यते संगच्छते। सृजेर्दैवादिकात्कर्तरि लट् ॥
Summary
AI
The morning breeze, as if desiring to enhance the natural fragrance of your breath with an external quality, carries flowers loosened from the stalks of trees and mingles with lotuses opened by the rays of dawn.
सारांश
AI
प्रातःकालीन वायु वृक्षों से झड़े फूलों को समेट रही है और खिले हुए कमलों का स्पर्श कर रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह वायु आपके मुख की स्वाभाविक सुगंध को प्राप्त करना चाहती हो।
पदच्छेदः
AI
| वृन्तात् | वृन्त (५.१) | from the stalk |
| श्लथं | श्लथ (२.१) | loosened |
| हरति | हरति (√हृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | carries |
| पुष्पम् | पुष्प (२.१) | flowers |
| अनोकहानां | अनोकह (६.३) | of trees |
| संसृज्यते | संसृज्यते (सम्√सृज् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | mingles |
| सरसिजैः | सरसिज (३.३) | with lotuses |
| अरुणांशुभिन्नैः | अरुण–अंशु–भिन्न (३.३) | opened by the rays of dawn |
| स्वाभाविकं | स्वाभाविक (२.१) | natural |
| परगुणेन | पर–गुण (३.१) | with an external quality |
| विभातवायुः | विभात–वायु (१.१) | the morning breeze |
| सौरभ्यम् | सौरभ्य (२.१) | fragrance |
| ईप्सुरिव | ईप्सु (√आप्+सन्+उ, १.१)–इव | as if desiring |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| मुखमारुतस्य | मुख–मारुत (६.१) | of the breath of the mouth |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृ | न्ता | च्छ्ल | थं | ह | र | ति | पु | ष्प | म | नो | क | हा | नां |
| सं | सृ | ज्य | ते | स | र | सि | जै | र | रु | णां | शु | भि | न्नैः |
| स्वा | भा | वि | कं | प | र | गु | णे | न | वि | भा | त | वा | युः |
| सौ | र | भ्य | मी | प्सु | रि | व | ते | मु | ख | मा | रु | त | स्य |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.