यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानु-
रह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् ।
आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर याते
किं वा रिपूंस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति ॥
यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानु-
रह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् ।
आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर याते
किं वा रिपूंस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति ॥
रह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् ।
आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर याते
किं वा रिपूंस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति ॥
अन्वयः
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वीर! यावत् प्रताप-निधिः भानुः अह्नाय न आक्रमते, तावत् अरुणेन तमः निरस्तम् । त्वयि आयोधन-अग्रसरतां याते (सति), तव गुरुः रिपून् स्वयं किम् उच्छिनत्ति वा?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यावदिति॥ प्रतापनिधिस्तेजोनिधिर्भानुर्यावन्नाक्रमते नोद्गच्छति।
आङउद्गमने (अष्टाध्यायी १.३.४० ) इत्यात्मनेपदम्। तावत्। भानावनुदित एवेत्यर्थः। अह्नाय झिटिति। द्राग्झटित्यञ्जसाह्राय इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१०३ ) । अरुणेनानूरुणा। सूर्यसूतोऽरुणोऽनूरुः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१०३ ) । तमो निरस्तम्। तथा हि- हे वीर। त्वय्यायोधनेषु युद्धेषु। युद्धमायोधनं जन्यम् इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१०३ ) । अग्रसरतां पुरःसरतां याते सति तव गुरुः पिता रिपून् स्वयमुच्छिनत्ति किं वा? नोच्छिनत्त्येवेत्यर्थः। न खलु योग्यपुत्रन्यस्तभाराणां स्वामिनां स्वयं व्यापारखेद इति भावः ॥
Summary
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O hero! Just as before the sun, that treasury of valor, fully rises for the day, the dawn dispels the darkness, so when you take the lead in battle, does your father need to destroy the enemies himself?
सारांश
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सूर्य के उदय होने से पूर्व ही अरुण ने अंधकार को मिटा दिया है। हे वीर! जब आप स्वयं युद्ध में अग्रणी हैं, तो आपके पूज्य पिता को शत्रुओं का विनाश करने की क्या आवश्यकता है?
पदच्छेदः
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| यावत् | यावत् | Just as |
| प्रतापनिधिः | प्रताप–निधि (१.१) | the treasury of valor |
| आक्रमते | आक्रमते (आ√क्रम् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | rises |
| न | न | not yet |
| भानुः | भानु (१.१) | the sun |
| अह्नाय | अहन् (४.१) | for the day |
| तावत् | तावत् | by then |
| अरुणेन | अरुण (३.१) | by the dawn |
| तमः | तमस् (१.१) | darkness |
| निरस्तम् | निरस्त (निर्√अस्+क्त, १.१) | is dispelled |
| आयोधनाग्रसरतां | आयोधन–अग्रसरता (२.१) | the lead in battle |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | you |
| वीर | वीर (८.१) | O hero |
| याते | यात (√या+क्त, ७.१) | having taken |
| किं | किम् | does |
| वा | वा | ? |
| रिपून् | रिपु (२.३) | the enemies |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| गुरुः | गुरु (१.१) | father |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| उच्छिनत्ति | उच्छिनत्ति (उद्√छिद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | destroy |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | व | त्प्र | ता | प | नि | धि | रा | क्र | म | ते | न | भा | नु |
| र | ह्ना | य | ता | व | द | रु | णे | न | त | मो | नि | र | स्तम् |
| आ | यो | ध | ना | ग्र | स | र | तां | त्व | यि | वी | र | या | ते |
| किं | वा | रि | पूं | स्त | व | गु | रुः | स्व | य | मु | च्छि | न | त्ति |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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