शय्यां जहत्युभयपक्षविनीतनिद्राः
स्तम्बेरमा मुखरश्रृङ्खलकर्षिणस्ते ।
येषां विभान्ति तरुणारुणरागयोगा-
द्भिन्नाद्रिगैरिकतटा इव दन्तकोशाः ॥
शय्यां जहत्युभयपक्षविनीतनिद्राः
स्तम्बेरमा मुखरश्रृङ्खलकर्षिणस्ते ।
येषां विभान्ति तरुणारुणरागयोगा-
द्भिन्नाद्रिगैरिकतटा इव दन्तकोशाः ॥
स्तम्बेरमा मुखरश्रृङ्खलकर्षिणस्ते ।
येषां विभान्ति तरुणारुणरागयोगा-
द्भिन्नाद्रिगैरिकतटा इव दन्तकोशाः ॥
अन्वयः
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ते उभय-पक्ष-विनीत-निद्राः मुखर-शृङ्खल-कर्षिणः स्तम्बेरमाः शय्यां जहति, येषां दन्त-कोशाः तरुण-अरुण-राग-योगात् भिन्न-अद्रि-गैरिक-तटाः इव विभान्ति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शय्यामिति॥ उभाभ्यां पक्षाभ्यां पार्श्वाभ्यां विनीताऽपगता निद्रा येषां त उभयपक्षविनीतनिद्राः। अत्र समासविषय
उभशब्दस्थाने उभय शब्दप्रयोग एव साधुरित्यनुसंधेयम्। यथाह कैयटः--"उभादुदात्तो नित्यम्" इति नित्यग्रहणस्येदं प्रयोजनं वृत्तिविषय उभशब्दस्य प्रयोगो मा भूत्। उभयशब्दस्यैव यथा स्यात्। उभयपुत्र इत्यादि भवति इति। मुखराण्युत्थानचलनाच्छब्दायमानानि शृङ्खलानि निगडानि कर्षन्तीति तथोक्तास्ते तव स्तम्बे रमन्त इति स्तम्बेरमा हस्तिनः। स्तम्बकर्णयो रमिजपाः (अष्टाध्यायी ३.२.१३ ) इत्यच्प्रत्ययः। हस्तिसूचकयोः(वा.१९९४)इति वक्तव्यात्। इभः स्तम्बेरमः पद्मी इत्यमरः (अमरकोशः २.८.३५ ) । तत्पुरुषे कृति बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इति सप्तम्या अलुक्। शय्यां जहति त्यजन्ति येषां स्तम्बेरमाणाम्। दन्ताः कोशाः इव दन्तकोशाः। दन्तकुडम्भलास्तरुणारुणरागयोगाद्बालार्कारुणसंपर्काद्धेतोर्भिन्नाद्रागैरिकतटा इव विभान्ति। धातुरक्ता इव भान्तीत्यर्थः॥
Summary
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Your elephants, whose sleep has been trained away from both sides of the night, are leaving their beds, dragging their clanking chains. Their tusks, tinged with the color of the young dawn, shine like the slopes of a mountain streaked with red ochre.
सारांश
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आपके हाथी अपनी जंजीरों को झनझनाते हुए जाग रहे हैं। प्रातःकालीन सूर्य की लालिमा पड़ने से उनके दांत ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो पर्वतों के गेरू वाले तट चमक रहे हों।
पदच्छेदः
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| शय्यां | शय्या (२.१) | their beds |
| जहति | जहति (√हा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are leaving |
| उभयपक्षविनीतनिद्राः | उभय–पक्ष–विनीत–निद्रा (१.३) | whose sleep is trained away from both sides (of the night) |
| स्तम्बेरमाः | स्तम्बेरम (१.३) | the elephants |
| मुखरशृङ्खलकर्षिणः | मुखर–शृङ्खल–कर्षिन् (१.३) | dragging their clanking chains |
| ते | तद् (१.३) | your |
| येषाम् | यद् (६.३) | whose |
| विभान्ति | विभान्ति (वि√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | shine |
| तरुणारुणरागयोगात् | तरुण–अरुण–राग–योग (५.१) | from contact with the color of the young dawn |
| भिन्नाद्रिगैरिकतटा | भिन्न–अद्रि–गैरिक–तट (१.३) | slopes of a mountain streaked with red ochre |
| इव | इव | like |
| दन्तकोशाः | दन्त–कोश (१.३) | tusks |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | य्यां | ज | ह | त्यु | भ | य | प | क्ष | वि | नी | त | नि | द्राः |
| स्त | म्बे | र | मा | मु | ख | र | श्रृ | ङ्ख | ल | क | र्षि | ण | स्ते |
| ये | षां | वि | भा | न्ति | त | रु | णा | रु | ण | रा | ग | यो | गा |
| द्भि | न्ना | द्रि | गै | रि | क | त | टा | इ | व | द | न्त | को | शाः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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