अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्टं
दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा ।
कुशलविरचितानुकूलवेषः
क्षितिपसमाजमगात्स्वयंवरस्थम् ॥
अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्टं
दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा ।
कुशलविरचितानुकूलवेषः
क्षितिपसमाजमगात्स्वयंवरस्थम् ॥
दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा ।
कुशलविरचितानुकूलवेषः
क्षितिपसमाजमगात्स्वयंवरस्थम् ॥
अन्वयः
AI
अथ अञ्चित-अक्षि-पक्ष्मा (कुमारः) शास्त्र-दृष्टम् दिवस-मुख-उचितम् विधिम् अवसाय्य, कुशल-विरचित-अनुकूल-वेषः (सन्) स्वयम्बर-स्थम् क्षितिप-समाजम् अगात्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथोत्थानानन्तरम्। अञ्चितानि चारुण्यक्षिपक्ष्माणि यस्य सोऽजः शास्त्रे दृष्टमवगतं दिवसमुखोचितं प्रातःकालोचितं विधिमनुष्ठानमवसाय्य समाप्य। स्ततेर्ण्यन्ताल्लयम्। कुशलैः प्रसाधनदक्षैर्विरचितोऽनुकूलः स्वयंवरोचितो वेषो नेपथ्यं यस्य स तथोक्तः सन् स्वयंवरस्थं क्षितिपसमाजं राजसमूहमगादगमत्-
इणो गा लुङि (अष्टाध्यायी २.४.४५ ) इति गादेशः। पुष्पिताग्रावृत्तमेतत्। तल्लक्षणम्-अयुजि नयुगरेफलो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा इति॥
Summary
AI
Then, having completed the morning rituals prescribed by the scriptures, Prince Aja, whose eyelashes were gracefully curved, dressed himself in an appropriate and skillfully arranged attire. He then went to the assembly of kings gathered for the svayamvara.
सारांश
AI
इसके पश्चात, शास्त्रों के अनुसार प्रातःकालीन आवश्यक कार्यों को पूरा कर और निपुणता से सुंदर वेशभूषा धारण कर, अज स्वयंवर के लिए राजाओं की सभा में पहुँचे।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | then |
| विधिम् | विधि (२.१) | the rites |
| अवसाय्य | अवसाय्य (अव√सो+णिच्+ल्यप्) | having completed |
| शास्त्रदृष्टम् | शास्त्र–दृष्ट (२.१) | prescribed by the scriptures |
| दिवसमुखोचितम् | दिवस–मुख–उचित (२.१) | appropriate for the morning |
| अञ्चिताक्षिपक्ष्मा | अञ्चित–अक्षि–पक्ष्मा (१.१) | he whose eyelashes were curved |
| कुशलविरचितानुकूलवेषः | कुशल–विरचित–अनुकूल–वेष (१.१) | he whose appropriate attire was skillfully arranged |
| क्षितिपसमाजम् | क्षितिप–समाज (२.१) | to the assembly of kings |
| अगात् | अगात् (√इण् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went |
| स्वयंवरस्थम् | स्वयंवर–स्थ (२.१) | gathered for the svayamvara |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | वि | धि | म | व | सा | य्य | शा | स्त्र | दृ | ष्टं | |
| दि | व | स | मु | खो | चि | त | म | ञ्चि | ता | क्षि | प | क्ष्मा |
| कु | श | ल | वि | र | चि | ता | नु | कू | ल | वे | षः | |
| क्षि | ति | प | स | मा | ज | म | गा | त्स्व | यं | व | र | स्थम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.